एक था गुल और एक थी बुलबुल...दोनों चमन में रहते थे...

संक्षेप:

  • बुलबुल का गहरा नाता जरूर कश्मीर की वादियों से है और इसके ऐतिहासिक संदर्भ भी है.
  • मिथकीय कहानी है कि बुलबुल ने यहूदियों के बुद्धिमान राजा सुलेमान को यह पहचानने की शक्ति दी थी कि कौन सा गुलदस्ता नकली फूलों से बना है और कौन असली फूलों से.
  • चमन में बुलबुल फिर से दोबारा मीठी धुन गुनगुना सकती है क्या?

  • सतीश वर्मा

क था गुल और एक थी बुलबुल... दोनों चमन में रहते थे... पता नहीं ये गाना मैं पिछले कई दिनों से गुनगुना रहा हूं. यह गाना 1965 में बनी फिल्म ‘जब-जब फूल खिले’ की है. सोच रहा था कि कुछ लिखूं, मगर क्यों लिंखू, सभी तो लिख ही रहे हैं. मैं गाना सुन कर ही बैचेन मन को शांत कर लूं. मगर नहीं, कहीं मैं पलायनवादी तो नहीं हो रहा हूं या फिर मौन धारण किए हुए कोई संत. लेकिन उस दिन जब मेरी नजर अचानक से भाई अव्यक्त के फेसबुक वाल पर पड़ी तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. मुझे ऐसा आभास हो रहा था, जिसे अंग्रेजी में कहते हैं न Intuition बिल्कुल वही. बुलबुल का गहरा नाता जरूर कश्मीर की वादियों से है और इसके ऐतिहासिक संदर्भ भी हैं. मैं इस अंतर्द्वंद में अभी था ही कि अव्यक्त भाई के लेख ने धुंधलके को खत्म कर सब कुछ साफ- सफ्फाक कर दिया. अव्यक्त भाई ने अपने लेख ‘हिमालयी बुलबुल और कश्मीर में इस्लाम का आगमन’ में उन सभी ऐतिहासक तथ्यों और मिथकों की पड़ताल की है, जिसमें बताया गया है कि कैसे हिमालयी चिड़िया बुलबुल की मीठी बोली घाटी में गूंजती रहती है.

अव्यक्त भाई के इस पोस्ट से पहले मैंने  फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ के इस गाने  ‘एक था गुल और एक थी बुलबुल, दोनों चमन में रहते थे’ गाने को आधार बनाकर कश्मीर पर कुछ लिखने की कोशिश की थी...  बहरहाल फिर लौटते हैं वहीं उस गाने पर , मैं जब-जब ये गाना गुनगुनाता हूं तो मेरे आँखों के सामने खान साहेब सामने आ जाते हैं. खान साहेब , पूरा नाम- प्रमोद कुमार दास. ये गाना पहली बार मैंने सुपौल में उन्हीं के आवाज में सुना है. एक समय था जब मैं नहीं इस गाने को सुनाने के लिए पूरा शहर खान साहेब से जिद करता रहता था. खान साहेब जब ये गाना गाते थे... तो सच में एक टीस निकलती थी, एक आह निकलती थी. काफी दर्द भरी होती थी उनकी आवाज में. रूहानी हो कर गाते थे वो ये गाना. वैसे अगर आज भी जब कि वो अब बुढ़ापे की ओर कदम बढ़ा रहे हैं जिद करेंगे तो वो गाना उसी रुहानी आवाज में सुना सकते हैं. प्रमोद कुमार दास का नाम खान साहेब किसने रखा ये मेरे लिए आज भी पहेली है. शायद केदार भैया को पता हो. बौआ भाई(स्व. शिवानंद लाल दास) से एक बार मैंने पूछा था, उन्हें भी नहीं पता था. ‘खान’ टाइटल वैसे तो मुसलमान रखते हैं, लेकिन हमारे इधर तो एक गांव है बनगांव, जहां के अधिकांश ब्राह्मणों का टाइटल खान ही है. इसका भी इतिहास जानना है मुझे. फिलहाल गुल और बुलबुल की कहानी को महसूसने की कोशिश कर रहा हूं.

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गुल और बुलबुल की कहानी बताती इस गाने के बोल में एक जगह आता है-

फिर एक दिन की बात सुनाऊँ

एक सय्याद चमन में आया

ले गया वो बुलबुल को पकड के

और दीवाना गुल मुरझाया...

यह सय्याद कौन था जिसने चमन को उजाड़ दिया. सय्याद मतलब बहेलिया. बहेलिया यानि शिकारी. किसने चमन में आग लगाई. चमन में क्यों गूंजने लगी बूटों की थाप, क्यों गरजने लगी बंदूकें? इतिहास किसी को माफ नहीं करता. उन्हें भी नहीं जो खुद को ईश्वर की पवित्र संतान कहते हैं. इतिहास रचा जाता है तो इतिहास दोहराता भी है खुद को.  इतिहास, इतिहास भी हो जाता है और इतिहास रचना एक बड़ी भूल भी.

इसी गाने की बोल में आगे है-

जिसका नाम मोहब्बत है वो

कब रूकती है दिवारों से

एक दिन आह गुल-ओ-बुलबुल की

उस पिंजड़े से जा टकराई

टूटा पिंजड़ा, छूटा कैदी, देता रहा सैय्याद दुहाई

रोक सके ना उस को मिलके,

सारा जमाना, सारी खुदाई

गुल साजन को गीत सुनाने,

बुलबुल बाग में वापस आई

चमन को गुलजार करने का दावा किया जा रहा है. कहा जा रहा है चमन की नई इबारत लिखी जाएगी. मगर किस शर्त पर. क्या पता उन्मादी उत्साह से लबरेज जो भीड़ जमीन हड़पने की बात कह रही है, कहीं वो चिनार के पेड़ों को काट कर धुंए उगलने वाली फैक्ट्री न खोलने लगे फटाफट, और अगर इन फैक्ट्रियों का कचड़ा अगर झीलों में गिरा तो फिर क्या होगा? अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ में एक जगह चर्चा आई है कि,  ‘माना जाता है और सच भी है कि यहां के नदियों और झीलों का पानी जीवों से मुक्त है और यही वजह है कि इनमें कभी सड़न नहीं होती है.’ मगर क्या गारंटी है कि कॉरपोरेट की गिद्ध नजर से झेलम की पानी और डल लेक की शीशे की तरह चमकती नीली जलराशि गंदली नहीं हो. कॉरपोरेट के सबसे बड़े महामानव और देश के सबसे बड़े धनकुबेर रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी जिसके आगे सभी सत्ता नतमस्तक रहती है ,उन्होंने तो कंपनी के अपने एजीएम(सालाना आम सभा) में बाजाब्ते यह घोषणा किया कि उनका समूह जम्मू कश्मीर तथा लद्दाख के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और यहां विकासात्मक गतिविधियों के लिए विशेष कार्यबल का गठन करेगा. सच में अब कश्मीर में विकास की नई सुबह होगी. विकास किसे प्यारा नहीं लगता है, कौन विकास के खिलाफ हो सकता है भला.  मगर हम केदारनाथ में आई तबाही को तो भी नहीं भूल सकते हैं. समाज के लोगों ने भी बहुत सारी जगहों पर नदियों में घुसपैठ की है, होटल बनाए हैं ताकि अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकें. एक समाज के रूप में हम भी शत-प्रतिशत ईमानदार नहीं रहे हैं. केदारनाथ में इसी अतिक्रमण और विकास की होड़ ने बाद में विनाशलीला भी दिखाई थी. क्या गारंटी है कि हम जन्नत की इस खूबसूरती को महफूज रखने के लिए शत-प्रतिशत ईमानदार रहें.

एक कहानी और है कल्हण के राजतरंगिणी में (अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’से उद्धृत). कथा यह है कि जब देवताओं ने घाटी के सौंदर्य को देखा तो उन्होंने वापस स्वर्ग लौटने से इंकार कर दिया और वे कश्मीर के पहाड़ों में बस गए. और देवियों ने नदियों का रुप धारण कर लिया. जब देवता कश्मीर से नहीं लौटे तो फिर आज के ये सैय्याद कैसे चमन को छोड़कर चले जाएंगे.

विकास उनका हो जो भटक गए हैं, जिनके हाथों में पत्थर है. बदलाव उनमें दिखे जिनके जेहन में मजहबी जहर है. जो आतंक की भाषा को ही अपनी भाषा मानने लगी है. ऐसे बदहवास और भटके युवाओं के लिए अगर 370 हटाने से नई सुबह आती है तो कौन नहीं स्वागत करेगा. मगर घाटी के भटके युवाओं को बूटों की थाप और गोलियों की तड़तड़ाहट से क्या हम विकास के हाइवे पर दौड़ा सकते हैं? विज्ञान कहता है जहर को खत्म करने के लिए जहर की ही जरूरत पड़ती है. लेकिन एंटीडोट का एक खतरा भी है, कहीं इसका ओवरडोज हो गया तो! सबसे बेहतर तो है महादेव की तरह विष ही पी ली जाए. हलाहल. मगर कौन बनेगा कश्मीर का महादेव. सभी यहां तो सैय्याद बनने ही आते हैं. कश्मीर में जो आता है वो यहां सैय्याद बन कर ही आता है. किसो को कश्मीर से इश्क नहीं है, उसे तो बस अपनी जेहनी जिद और ऐतिहासिक पूर्वाग्रह की पड़ी है, वो इससे बाहर आ कर सोचते ही नहीं हैं.  

एक था गुल और एक थी बुलबुल.... बुलबुल बड़ी ही प्यारी चिड़िया है, मीठी बोल बोलती है और खास बात यह है कि अक्सर युगल में ही देखी जाती है.  मिथकीय कहानी है कि बुलबुल ने यहूदियों के बुद्धिमान राजा सुलेमान को यह पहचानने की शक्ति दी थी कि कौन सा गुलदस्ता नकली फूलों से बना है और कौन असली फूलों से. सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा. अल्लमा इक़बाल ने तो पूरे हिन्दोस्तां को बुलबुल की संज्ञा दे दी थी. गरजे यह अलग बात है कि इकबाल की राजनीति पाकिस्तान में जाकर पनाह लेती है. इक़बाल की कहानी कहते हुए कोई-कोई यह भी याद दिलाता है कि उनके पुरखे कश्मीरी पंडित थे, अल्लामा अपने पूर्वजों पर नाज करने वालों में थे. हां बात तो यह भी है आज भी हिन्दुस्तान की आजादी के जश्न में इकबाल के तराने सारे जहां से अच्छा  हिन्दोस्तां हमारा पर फौजी धुन बजते हैं. हमेशा से एक-दूसरे को फूटी आंख से भी ना सुहाने वाले दो मुल्कों के अवाम के दिल में इक़बाल के लिए कमोबेश एक-सी मोहब्बत अभी भी बनती चली आ रही है? किसी ने सच कहा है कि- क्या इक़बाल भारत और पाकिस्तान नाम के दो मुल्कों की सरहद के बीचों-बीच पड़ने वाली एक दरम्यानी जगह का नाम है? तो फिर हम इस गुलिस्तां में भाईचारे के मीठे गीत गानेवाली बुलबुलें नहीं बन सकते हैं क्या? चमन में बुलबुल फिर से दोबारा मीठी धुन गुनगुना सकती है क्या?

(जम्मू- कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने को एक महीने हो गए हैं)

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