चांद पर जाकर क्या-क्या करेगा Chandrayan-2, जानिए Mission Moon से जुड़ी हर बातें

संक्षेप:

  • इसरो चंद्रयान-2 के जरिए चांद की सतह की जानकारी एकत्र करेगा.
  • मिशन मून से भारत चांद पर मौजूद बड़े `खजाने` को भी कर सकता है हासिल.
  • चंद्रयान-2 के चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग होते ही भारत ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा.

श्री हरिकोटा: भारत के मिशन चंद्रयान-2 का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. ‘चंद्रयान 2’ श्रीहरिकोटा से 22 जुलाई को दो बजकर 43 मिनट पर लॉन्च होगा. 15 जुलाई को तकनीकी गड़बड़ी आने के बाद चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग रोकनी पड़ी थी, लेकिन अब सारी कमियों को दूर कर दिया गया है. बताया जा रहा है कि लॉन्चिंग के बाद इसे चांद तक पहुंचने में 40 दिन से ज्यादा का वक्त लगने वाला है. इस मिशन से जुड़ी पूरी जानकारी आगे दी जा रही है.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) चंद्रमा के साउथ पोल पर चंद्रयान-2 को उतारेगा. बता दें कि चांद के इस हिस्से के बारे में दुनिया को ज्यादा जानकारी नहीं है. इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-2 चांद के भौगोलिक वातावरण, खनिज तत्वों, उसके वायुमंडल की बाहरी परत और पानी की उपलब्धता की जानकारी एकत्र करेगा.

मिशन मून के तहत चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर कदम रखेगा. दरअसल, चांद को फतह कर चुके अमेरिका, रूस और चीन ने अभी तक इस जगह पर कदम नहीं रखा है. चंद्रमा के इस भाग के बारे में अभी बहुत जानकारी भी सामने नहीं आ पाई है. भारत के चंद्रयान-1 मिशन के दौरान साउथ पोल में बर्फ के बारे में पता चला था. तभी से चांद के इस हिस्से के प्रति दुनिया के देशों की रूचि जगी है. भारत इस बार के मिशन में साउथ पोल के नजदीक ही अपना यान लैंड करेगा. ऐसे में माना जा रहा है कि भारत मिशन मून के जरिए दूसरे देशों पर बढ़त हासिल कर लेगा. कहा जा रहा है कि चंद्रयान-2 के जरिए भारत एक ऐसे अनमोल खजाने की खोज कर सकता है जिससे न केवल अगले करीब 500 साल तक इंसानी ऊर्जा जरूरतें पूरी की जा सकती हैं बल्कि खरबों डॉलर की कमाई भी हो सकती है. चांद से मिलने वाली यह ऊर्जा न केवल सुरक्षित होगी बल्कि तेल, कोयले और परमाणु कचरे से होने वाले प्रदूषण से मुक्त होगी.

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काफी रोचक है चांद का साउथ पोल

चांद का साउथ पोल काफी रोचक है. चंद्रमा का साउथ पोल विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि इसकी सतह का बड़ा हिस्सा नॉर्थ पोल की तुलना में अधिक छाया में रहता है. संभावना इस बात की भी जताई जाती है कि इस हिस्से में पानी भी हो सकता है. चांद के साउथ पोल में ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में प्रारंभिक सौर प्रणाली के लुप्‍त जीवाश्म रिकॉर्ड मौजूद है. चंद्रयान-2 विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर का उपयोग करेगा जो दो गड्ढों- मंजिनस सी और सिमपेलियस एन के बीच वाले मैदान में लगभग 70° दक्षिणी अक्षांश पर सफलतापूर्वक लैंडिंग का प्रयास करेगा.

भारत के लिए क्या है चुनौती?

मिशन चंद्रयान-2 में भारत के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं. भारत पहली बार चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा. चांद पर लैंडिंग करते ही भारत ऐसा करने वाले अमेरिका, रूस और चीन के साथ चौथा देश हो जाएगा. भारत पहले 15 जुलाई को चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग करने वाला था, लेकिन क्रॉयोजेनिक इंजन में लीकेज के कारण इसे आज तक के लिए रोक दिया गया था. इसरो चीफ के सिवन ने भी कहा है कि लैंडिंग से 15 मिनट पहले का वक्त काफी चुनौतीपूर्ण रहेगा. उन्होंने कहा कि ये 15 मिनट काफी तनावपूर्ण होंगे क्योंकि इसरो पहली बार चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा.

ऊर्जा जरूरतों के लिए चांद पर फतह की कोशिश!

एक विशेषज्ञ का अनुमान है कि एक टन हीलियम-3 की कीमत करीब 5 अरब डॉलर हो सकती है. चंद्रमा से ढाई लाख टन हीलियम- 3 लाया जा सकता है जिसकी कीमत कई लाख करोड़ डॉलर हो सकती है. चीन ने भी इसी साल हीलियम- 3 की खोज के लिए अपना चांग ई 4 यान भेजा था. इसी को देखते हुए अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय देशों की चंद्रमा के प्रति दिलचस्पी बढ़ गई है. यही नहीं दुनिया की दिग्गज ई-कॉमर्स कंपनी ऐमजॉन के मालिक जेफ बेजोस चंद्रमा पर कॉलोनी बसाने की चाहत रखते हैं.

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