Article 15 फिल्म बनाने वाले मूर्ख बना गए हमें! जनाब जात-पात तो सबसे ज्यादा पढ़े लिखे एलिट ही करते हैं

संक्षेप:

  • क्यों अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी पर यह आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने सवर्णवादी नजरिए से आर्टिकल 15 फिल्म को बनाया?
  • जानबूझ कर फिल्म में सवर्ण को दलित का मुक्तिदाता दिखाया गया, मसीहा दिखाया गया.
  • फिल्म ने साजिश के तहत एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दलित तो मूर्ख ही होते हैं

  • सतीश वर्मा

- जिसे जातिवाद कहा जाता है वह मूलतः जातियों का राजनीतिकरण है- रजनी कोठारी

- जाति और राजनीति के मेल-मिलाप से बिना किसी भारी उठापटक के समाज का लौकिकीकरण हो गया- रजनी कोठारी

- कौन कहता है शहरों में जात-पात नहीं होती है, कौन कहता है कि पढ़े लिखे लोग-अभिजात्य बौद्धिक जातिप्रथा को नहीं मानते? रोहित वेमुला के साथ जो हुआ वो मेट्रो सिटी में हैदराबाद में ही हुआ और वो भी उच्च शिक्षण संस्थान में.

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अब कुछ बातें फिल्म पर

इंटरवल से ठीक पहले जब एसएसपी अयान रंजन (टाइटल में जाति नहीं है) अपने मातहत पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों से जाति के बारे में पूछता है तो सभी बारी-बारी से अपनी-अपनी जाति बताते हैं, जाटव, कायस्थ, ठाकुर, पासी सभी अपनी जाति बताते हैं. मगर हैरानी तब होती है जब एसएसपी अयान रंजन पूछते हैं कि मैं किस जाति का हूं? उन्हें उनके मातहत बताते हैं कि आप सूर्यपरायण ब्राह्मण है, कान्यकुब्ज वाले आपसे ऊंचे है. चौंकता मैं तब हूं जब थियेटर में फिल्म देख रहे सभी दर्शक इस सीन पर खींसे निपोर-निपोर कर जोर-जोर से हंस रहे होते हैं.  मैं थोड़ा असहज हो जाता हूं. क्यों हंस रहे हैं ये लोग! डेविड धवन की कोई कॉमेडी फिल्म की सीन तो नहीं है यह. उनके हंसने की वजह मुझे तभी समझ में नहीं आई, बाद में रुम में आकर मुझे लगा कि फिल्म वाले अपने मकसद में कामयाब हो गए. उन्हें दर्शकों को हंसाना था, उनकी सहानुभूति बटोरनी थी और कमाना था इसलिए हीरो को जातिहीन, वर्णहीन दिखाया गया. हीरो अयान रंजन के लिए जाति एक अबूझ पहेली की तरह खड़ी की गई. जैसे जाति नहीं हो कोई फैंटेसी हो, कुछ इस तरह शुरू से लेकर अंत तक फिल्म को इसी टेंपरामेंट में बांध कर रखा गया. जाति तो चांद पर भी है जनाब, स्पेस स्टेशन पर भी है जनाब.

हीरो एसएसपी अयान रंजन अगर वर्णहीन थे तो फिल्म के शुरूआत में ही उन्हें गोरा की बेटी पूजा (वो तीसरी लड़की) जो गायब है, को खोजने के लिए टैनरी के गंदे कीचड़ और दलदल से भरे डबरे में कूद जाना चाहिए था. मगर टैनरी के गंदे कीचड़ और दलदल से भरे डबरे में घुस कर पूजा को खोजने के लिए एसएसपी साहब को मेहतरों की जरूरत थी. इसके लिए एसएसपी अयान जो ब्राह्मण ही थे जात से, परेशान थे कैसे मेहतरों की हड़ताल खत्म होगी और कैसे उन्हें उस कीचड़- दलदल में घुसा कर पूजा की खोज शुरू की जा सके. बात यहीं समाप्त नहीं होती है, फिल्म के अंत में जब पूजा को ढूंढने की आस खो चुके एसएसपी अयान रंजन भी दलदल में कूद जाते हैं तो जाटव जाति के उनके सीनियर मातहत उनसे पूछते हैं- आप क्यों इस कीचड़ में कूद गए साहब तो एसएसपी अयान बोलते है- क्यों ब्राह्मण  को भी तो कभी न कभी ये काम करना ही होगा...  और इस तरह ब्राह्मण दलितों के हीरो बन जाते हैं, दलितों के मुक्तिदाता बन जाते हैं. ब्राह्मण ही मुक्तिदाता है इसको साबित करने के लिए फिल्मकारों ने पूरे फिल्म में हीरोइज्म को महिमामंडित किया है.

इस फिल्म ने एक बार फिर उस बहस को जिंदा कर दी है जिसमें घोषणा की गई थी कि सिर्फ एक दलित ही अपनी स्वानुभूति के आधार पर दलित जीवन के यथार्थ का प्रमाणिक चित्रण कर सकता है. यह बहस आज से नहीं तब से चली आ रही है जब से दलित साहित्य मेनस्ट्रीम में आई, राजेंद्र यादव के हंस के जमाने से पहले से ही ये बहस जिंदा है. वैसे दलित साहित्य को मेनस्ट्रीम में लाने का सारा श्रेय राजेंद्र यादव को ही जाता है. यह सवाल कितना जायज है कि- क्या दलित मुक्ति के प्रश्न पर सिर्फ दलितों का ही सर्वाधिकार सुरक्षित होना चाहिए? इसी सवाल के बरअक्स आपको याद रहना चाहिए कि जब दलितवादी- अंबेडकरवादी लेखक प्रेमचंद को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं. इतना ही नहीं प्रेमचंद की चर्चित रचना ‘रंगभूमि’ को तो कुछ दलितवादी लेखकों और संगठनों ने जलाने की घोषणा तक कर डाली थी. किस तरह मशहूर लेखक और विचारक मुद्राराक्षस ने प्रेमचंद को न सिर्फ दलित विरोधी बल्कि वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक तक साबित कर दिया था. लेकिन यहां उन विवादों की तह में जाने का आशय मेरा यह नहीं है कि प्रेमचंद का दलित प्रेम झूठा था या फिर प्रेमचंद दलित विरोधी थे. मगर आर्टिकल 15 फिल्म के बहाने उस बहस को फिर से कुछ दलितवादी- अंबेडकरवादी क्यों जिंदा कर रहे हैं , इसे समझने की जरूरत है.

क्यों अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी पर यह आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने सवर्णवादी नजरिए से फिल्म को बनाया, जानबूझ कर फिल्म में सवर्ण को दलित का मुक्तिदाता दिखाया गया, मसीहा दिखाया गया. जब अयान रंजन की गर्लफ्रेंड जो विदेश में रहती है और जिससे अयान रंजन हमेशा सलाह लेता रहता है- वो अपने दोस्त अदिति से कहता है- ‘हमें एक हीरो चाहिए अदिति’ और अदिति उसे कहती है- ‘हमें हीरो नहीं चाहिए अयान, हमें बस वो लोग चाहिए जो हीरो का वेट नहीं करें.’  मगर क्या फिल्म में ऐसा होता है? शायद नहीं. हीरो तो अयान रंजन ही बनते हैं. फिल्म में दलितों का हीरो निषाद जो गोरा का प्रेमी है जिसका किरदार भीम आर्मी के चंद्रशेखर की तर्ज पर गढ़ा गया है, क्यों नहीं उसे उन बापों के मुक्तिदाता के रुप में दिखाया गया जिनकी लड़कियों का अस्मत लुट कर, मार कर , गांव के बीचोबीच पेड़ पर टांग दिया गया था. राजनीति इसकी इजाजत नहीं दे रहा था शायद. सत्ता की राजनीति ही नहीं फिल्म की राजनीति भी होती है. वैसे फिल्मकार को सच के साथ छेड़छाड़ करने की पूरी इजाजत है, लेकिन ये दावा नहीं करना चाहिए था कि फिल्म बंदायू रेप कांड की सच्ची घटना पर आधारित है.

जाति एक सार्वभौम सच है और इसे पॉपकॉर्न खाते हुए और खीं-खीं कर हंसते हुए नकार नहीं सकते हैं. कहां नहीं है जाति. जहां जाति नहीं है वहां नस्लीय भेद है, धर्म-विभेद है, गोरा-काला है. बॉब डिलन का गाना सुनते विदेश से आया हीरो अयान रंजन जाति को लेकर इतना अनजान और निस्पृह कैसे हो सकता है. फिल्म में जाति को लेकर अयान रंजन का जो एक अनजानापन है वो काफी खटकता है. दरअसल पूरे फिल्म में फिल्मकार बार-बार यह दिखाना चाहते हैं कि मूर्ख लोग ही जात-पात करते हैं. पढ़े-लिखे लोग तो मंगल ग्रह के प्राणी हैं, उन्हें तो पता ही नहीं जात-पात क्या होता है? फिल्मकारों ने कितने शातिराना साजिश के तहत एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दलित तो मूर्ख ही होते हैं, दलित तो ऐसे ही होते हैं. शायद इसी ग्रंथि से यह फिल्म बनाई गई है. तभी तो हीरो एसएसपी अयान रंजन फिल्म के अंत में पूछते हैं- अम्मा किस जाति की हो... कितना वीभत्स प्रश्न है यह. भूल कर भी यह मत समझिए कि एसएसपी अयान रंजन को नहीं पता है जात-पात. उन्हें बखूबी पता है क्या है जात-पात.

(डिसक्लेमर- आलेख में प्रकाशित विचार और टिप्पणी पूर्णत: लेखक के हैं और इससे NYOOOZ किसी भी तरह की सहमति नहीं रखता है )

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