जानिए कौन हैं पदमा बाई झारा, इनकी हुनर बेजान मूर्तियों में मानो फूंक दे रही हैं प्राण

संक्षेप:

नोएडा: साल 1964 में एक हिंदी फिल्म आई थी `गीत गाया पत्थरों ने`। इसमें बेजान पत्थरों को सजीव रूप देने वाले शिल्पकार की अनोखी कहानी दिखाई गई थी। छत्तीसगढ़ के पदमा बाई झारा व पति सूदन झारा भी कला के ऐसे ही जादूगर हैं। ये मिट्टी और मोम की मदद से बेजान पीतल को वन्य जीव, देवी-देवताओं, रामायण व लोक कथाओं से जुड़ी मूर्तियों को अपने हुनर से मानों प्राण फूंक दे रहे हैं। बिल्कुल सजीव लगती इन मूर्तियों को देखकर लगता है मानों ये बोल उठेंगी, गा उठेंगी। आप भी इन्हें देखकर खुद को कहने से रोक नहीं पाएंगे कि ..वाकई, बेजान मूर्तियां भी गीत गाती हैं।

नोएडा: साल 1964 में एक हिंदी फिल्म आई थी `गीत गाया पत्थरों ने`। इसमें बेजान पत्थरों को सजीव रूप देने वाले शिल्पकार की अनोखी कहानी दिखाई गई थी। छत्तीसगढ़ के पदमा बाई झारा व पति सूदन झारा भी कला के ऐसे ही जादूगर हैं। ये मिट्टी और मोम की मदद से बेजान पीतल को वन्य जीव, देवी-देवताओं, रामायण व लोक कथाओं से जुड़ी मूर्तियों को अपने हुनर से मानों प्राण फूंक दे रहे हैं। बिल्कुल सजीव लगती इन मूर्तियों को देखकर लगता है मानों ये बोल उठेंगी, गा उठेंगी। आप भी इन्हें देखकर खुद को कहने से रोक नहीं पाएंगे कि ..वाकई, बेजान मूर्तियां भी गीत गाती हैं।

जिला रायगढ़ स्थित एकताल गांव निवासी पदमा बाई झारा व पति सूदन झारा सेक्टर-33 स्थित शिल्प हाट में आयोजित सरस आजीविका मेले में बेलमेटल आर्ट के तहत बनाई गई मूर्तियों व कई तरह के सजावटी उत्पादों के लेकर पहुंचे हैं। उनकी कलाकृतियां लोगों को सहज ही लुभा रही हैं।

51 वर्षीय पदमा बाई झारा बताती हैं कि उनका परिवार पुश्तैनी तौर पर बेलमेटल शिल्प के पेशे से जुड़ा है। वे घोड़े, हाथी, आदिवासियों के आभूषण आदि बनाने का कार्य पिछले करीब 20 वर्षो से कर रहीं हैं। बचपन में घर में बड़ों को बेलमेटल की मूर्तियां बनाते देखा, तो खेल-खेल में कच्ची मिट्टी की खिलौने बनाने लगीं। शादी के बाद पति के साथ मिलकर इस कला को ही कमाई का जरिया बना लिया। आज वह इस शिल्प कला को देश ही नहीं, विश्व पटल पर नई पहचान दें रही हैं। उन्हें 2012 में राज्य सरकार से पुरस्कार मिल चुका है। उनके पति कलाकृतियां बनाने में उनकी मदद करते हैं। वह भी कई बार राज्यस्तरीय सम्मान पा चुके हैं।

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उधर, पदमा बाई झारा के पति सूदन झारा बताते हैं कि बेलमेटल आर्ट में मिट्टी व मोम की कला का विशेष महत्व होता है। मूर्ति बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। मिट्टी व मोम के माध्यम से पात्र बनाकर उसे आग में तपाकर पीतल की मूर्ति में परिवर्तित किया जाता है। इन पर बारीक कारीगरी होती है। यह कलाकृतियां पूरी तरह से हाथों से बनी होती हैं। वे नोएडा में पहली बार प्रदर्शनी में शामिल हुए हैं। उनके स्टाल पर 200 रुपये से लेकर 10 हजार रुपये तक की मूर्तियां उपलब्ध हैं। इससे पहले क्राफ्ट म्यूजियम नई दिल्ली, सूरजकुंड, रायपुर, न्यू मार्केट भोपाल, इन्दौर, ग्वालियर, आगरा आदि में आयोजित प्रदर्शनी में हिस्सा ले चुके हैं।

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