निर्भया केस: फांसी से बचने के लिए आरोपियों के पास अब ये है रास्ता !

संक्षेप:

  • निर्भया गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
  • कातिलों की फांसी की सजा को रखी बरकरार
  • नीचे पढ़े- कातिलों के पास ये दो रास्ते

निर्भया गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चार दोषियों में से तीन की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है यानि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी फांसी की सजा को बरकरार रखेगा। चार में से तीन दोषियों ने कोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया है। जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि आपराधिक मामलों में रिव्यू तभी संभव है, जब कानून में कोई स्पष्ट गलती हो। सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2017 को दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से सुनाए गए फांसी की सजा पर मुहर लगाई थी। दोषियों ने इस फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा था।

रिव्यू पिटिशन खारिज होने के बाद अब आरोपियों के पास क्यूरेटिव पिटिशन डालने का रास्ता बचा हैय़ अगर वहां भी याचिका खारिज हो जाती है तो राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं होगा। अगर राष्ट्रपति भी चारों की दया याचिका खारिज कर देते हैं तो उनके पास कोई और विकल्प नहीं होगा।

क्या है क्यूरेटिव पिटिशन

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जब किसी मुजरिम की दया याचिका रिव्यू पिटिशन में खारिज कर दी जाती है तब क्यूरेटिव पिटिशन डालकर मुजरिम अपने लिए रहम की गुहार लगा सकता है। क्यूरेटिव पिटिशन उस मुजरिम के पास मौजूद अंतिम मौका होता है, जहां सजा में रियायत मिल सकती है। क्यूरेटिव पिटिशन की सुनवाई कोर्ट रूम में न होकर बंद चेंबर में होती है। क्यूरेटिव पिटिशन किसी भी मामले में भारतीय न्याय व्यवस्था की अंतिम कड़ी होती है। इसमें फैसला आने के बाद मुजरिम के पास रहम की आखिरी गुंजाइश राष्ट्रपति की दया ही रह जाती है।

दरअसल, प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ के. मुकेश (29), पवन गुप्ता (22) और विनय शर्मा की याचिकाओं को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि निर्भया कांड सदमे की सुनामी थी। कोर्ट ने कहा कि वारदात को क्रूर और राक्षसी तरीके से अंजाम दिया गया। और इस वारदात ने समाज की सामूहिक चेतना को हिला दिया था। जस्टिस भानुमति ने कहा कि बचपन से ही बच्चों को ये शिक्षा दी जानी चाहिए कि कैसे महिलाओं की इज्जत करें।

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