नोएडा: महाभारत काल के ऐतिहासिक द्रोणाचार्य मंदिर के पुनर्निर्माण पर पुरातत्व विभाग ने लगाई रोक, मंदिर का है ये इतिहास

संक्षेप:

  • द्रोणाचार्य मंदिर में पुनर्निर्माण पर पुरातत्व विभाग ने लगाई रोक
  • मंदिर की मरम्मत के लिए सरकार से मिले थे 70 लाख रुपए
  • विभाग से अनुमति के बाद ही फिर से शुरू होगा निर्माण कार्य

नोएडा: दनकौर। ऐतिहासिक द्रोणाचार्य मंदिर में दो दिन से गोशाला समिति की देखरेख में मंदिर की मरम्मत का कार्य चल रहा था। जिसे पुरातत्व विभाग मेरठ ने रुकवा दिया है। साथ ही मंदिर समिति के प्रबंधक को चेतावनी दी है कि अगर ऐसी गलती दोबारा की तो एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। ये लोग पुरातत्व विभाग से अनुमति लिए बिना निर्माण करा रहे थे। विभाग ने इससे पहले इनके खिलाफ नोटिस भी जारी किया था।

मंदिर की मरम्मत के लिए सरकार से मिले थे 70 लाख रुपए

द्रोण गोशाला समिति के प्रबंधक रजनीकांत अग्रवाल ने बताया कि द्रोणाचार्य मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित किया गया है। इसे विकसित करने के लिए प्रदेश सरकार से 70 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृति हुई है। मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए जेवर विधायक ने काफी प्रयास किया था। इसकी मरम्मत की जिम्मेदारी सरकारी संस्था सिडको को दी गई। संस्था की तरफ से गोशाला समिति की देखरेख में मंदिर की मरम्मत का कार्य कराया जा रहा था। मंगलवार दोपहर पुरातत्व विभाग की टीम मंदिर पहुंच गई और निर्माण कार्य को रुकवा दिया। बिना अनुमति के निर्माण की जानकारी जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह व पर्यटन विभाग को भी दे दी गई।

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विभाग से अनुमति के बाद ही फिर से शुरू होगा निर्माण कार्य

पुरातत्व विभाग के अधीक्षण अधिकारी डीबी गणनायक ने बताया कि द्रोणाचार्य मंदिर और तालाब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संपत्ति है। विभाग की अनुमति लिए बिना कोई भी इस संपत्ति से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। साथ ही इसके 200 मीटर के दायरे में निर्माण कार्य के लिए भी अनुमति लेना जरूरी है। यह सरल प्रक्रिया है। ऑनलाइन आवेदन करने के बाद मानकों के अनुसार अनुमति दी जाती है। मंदिर में निर्माण कार्य होने की जानकारी मिली थी। उसे रुकवा दिया गया है। विभाग से अनुमति के बाद ही फिर से निर्माण कार्य शुरू हो सकेगा।

एतिहासिक द्रोण मंदिर का इतिहास

महाभारत काल में कौरव और पांडवों को गुरु द्रोणाचार्य ने दनकौर में शिक्षा दी थी। करीब 30 दशक पहले इसी स्थान पर गुरु द्रोणाचार्य का ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर के पास एक तालाब भी है। परिसर में एकलव्य पार्क है। यह भी मान्यता है कि एकलव्य ने द्रोणाचार्य को गुरु मानकर शिक्षा का अभ्यास किया था। यहीं गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से दीक्षा भी ली थी। तालाब की विशेषता है कि तेज बारिश के बाद भी इसमें पानी नहीं भरता है। करीब 10 दशक से द्रोण गोशाला समिति यहां विशाल दंगल और मेले का आयोजन भी कराती है।

होती है द्रोणाचार्य की आरती

मंदिर में एकलव्य की बनाई गई प्रतिमा लोगों के लिए आर्कषण का केंद्र है। बताया जाता है कि महाभारत काल में एकलव्य ने मूर्ति बनाई थी। जो आज भी मंदिर में पूरे वैभव के साथ विराजमान है। समय के साथ-साथ दनकौर का नाम भी चेंज कर दिया गया। जानकारों की माने तो प्राचीन काल में कस्बा द्रोणकौर के नाम से विख्यात था। एकलव्य ने इसी स्थान पर गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर धर्नुविद्या का अभ्यास किया था। शिक्षा-दीक्षा न देने के बाद भी एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना गुरु माना था। यहीं पर गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अपनी गुरु दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांगा था। आज इस मंदिर में हर रविवार को पूजा-अर्चना के साथ-साथ प्रखांड पंडित द्रोणाचार्य की आरती भी करते है।

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