इलाहाबाद कल आज और...आजाद पार्क: अतीत में गूंजते पत्थर और लहराते दरख्तों के साये

  • Hasnain
  • Monday | 4th December, 2017
  • local
संक्षेप:

  • इलाहाबाद पहुंची थी 1857 की लड़ाई के बाद  मंगल पाण्डे की बगावत की आंधी।
  • गोरी सरकार का विरोध करने पर तहस-नहस कर दिया गया था मेवातियों का जीवन।
  • पेड़ों पर चढ़ गई थीं सुनील गावस्कर की बैटिंग देखने वालों की भीड़।

 

 

--वीरेन्द्र मिश्र

इलाहाबाद शहर की अपनी पहचान से जुड़ा है - यहां का कम्पनी बाग, जिसके बगीचे के हर छोर में अलग-अलग कहानियां समाहित हैं। न जाने कितने ही कालछन्दों से लेकर हास-परिहास, सृजनशीलता कलात्मक वैभव और अतीत के पन्नों की अनगिनत स्मृतियों का फैलाव, यहां के आम्र वृक्षों, अशोक वृक्ष, इमली, कैथा, जंगल जलेबी, अमरुद, शीशम, पाकड़, महुआ, झड़बेरी, कमरक, करौंदा क्या-क्या नहीं है। फूलों की ऐसी बगिया कि बस उसके परिसर में पहुंचते ही सुवासित होता मन खिल उठता है। यहां के दरख्तों के साये सुहाते हैं, मनुहार करते हैं।

कम्पनी बाग

शहीद की चिता पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा। सच! आज कम्पनी बाग यानी ‘अल्फ्रेड पार्क’ आज ‘चन्द्रशेखर आजाद पार्क’ के नाम से ऐतिहासिक पन्नों की पहचान बना है और हर दिन यहां लोग फूल चढ़ाते हैं। कम्पनी बाग पहले अंग्रेजों की आरामगाह पार्क के रुप में स्थापित रहा। शिक्षा ज्ञान पिपासुओं से लेकर जंगल जीवन की पहचान से भी जुड़ा रहा है ये क्षेत्र, परन्तु यहां जंगली जानवर रहते रहे हों। ऐसा पिछले काल में कोई प्रमाण नहीं मिलता, क्योंकि अल्फ्रेड के नाम पर बनने के बाद कम्पनी बाग पूरी तरह से मानव निर्मित पार्क के रुप में बेमिसाल पहचान बना चुका था। पूरा क्षेत्र बगिया और रंग-बिरंगे फूलों की डालियों से लहलहाता रहता है।

चन्द्रशेखर आजाद पार्क

चन्द्रशेखर आजाद पार्क

हालांकि 1857 की लड़ाई के बाद जब ‘मेरठ में गदर’ और मंगल पाण्डे की बगावत की आंधी इलाहाबाद में पहुंची थी। तो यहां सम्राट अकबर के किले में तैनात सेनानियों पर भारत के सिपाहियों ने अपनी जंग की ताकत बता दी थी। यहां शम्साबाद नाम से बहादुर मेवातियों का गांव भी था। जहां खुलकर गोरी सरकार का विरोध करने के कारण कम्पनी बाग के आहाते में ही उन अमर मेवातियों का जीवन तहस-नहस कर दिया गया था। उनका पूरा गांव कब्रगाह बना दिया गया था। 1857 के जंगी सिपाहियों की ताकत से पन्ने भरे-पड़े हैं। इलाहाबाद शहर की चौक का विशाल नीम का वृक्ष आज भी गवाह के रुप में खड़ा है। यह बात जरुर है कि वह वृक्ष आज बूढ़ा और जर्जर हो चुका है, जबकि न जाने कितने ही अमर शहीदों की लाशों को गोरी सरकार ने इसी वृक्ष में फांसी के फंदे में बांध कर लटका दिया गया था।

नीम का वृक्ष

मेरठ गदर

मंगल पाण्डे

कम्पनी बाग ही चन्द्रशेखर आजाद की वीर तपो भूमि रही हैं, जहां गद्दार चाटुकार कुछ मुखबरी करने वालों के चलते गोरी पलटन के सिपाहियों ने उन्हें मारने के लिए घेर लिया था, परन्तु महान सेनानी भारत मां के सपूत का बाल बांका भी नहीं कर सके। जब विषम परिस्थितियां  थी, तो उन्होंने अपनी कनपटी पर अपनी ही पिस्टल से गोली मार कर स्वयं को भारत मां की गोद में सुला दिया था। आजाद की वह पिस्टल आज भी इलाहाबाद के संग्रहालय में अतीत के पन्नों से रुबरु कराती संरक्षित हैं। आज उनकी स्मृतियों का सैलाब उस शहीद स्थली पर पहुंचते ही कोटर से छन-छन कर आने लगती है। कैसी अजीब विडम्बना है कि ‘लार्ड म्योर’ यही अपनी परिकल्पनाओं की ऐतिहासिक ज्ञानशाला ‘म्योर सेण्टर कॉलेज’ बनवाई, जो आज भी पूरब का ‘ऑक्सफोर्ड’ कहलाती है। वहां के विज्ञान के विद्यार्थी दुनिया को अपनी मुट्ठी में बन्द करते रहे हैं, न जाने कितने ही भौतिक और रसायन विज्ञानी उन मनीषियों की शरण में जाने में फक्र महसूस करते रहे (यह चर्चा फिर कभी)। यह अपने आप में अजूबी ही नहीं ऐतिहासिक कालखण्ड का कथानक है।

चन्द्रशेखर आजाद

पिस्टल

लार्ड म्योर ने ही पहल कर उस काल में सन् 1870 के आस-पास जब सर अल्फ्रेड इलाहाबाद आये थे, तो उनके नाम पर ही यहां जिस पार्क की परिकल्पना का ताना-बाना बुनवाया। वही बाद में ‘अल्फ्रेड पार्क’ के नाम से जाना गया। शहीद चन्द्रशेखर आजाद के बलिदान के बाद वह पार्क ‘कम्पनी बाग’ के नाम से जाना जाता रहा, किन्तु आज गर्व है कि वही पार्क ‘आजाद पार्क’ के नाम से प्राण प्रतिष्ठित हो चुका है। महान अमर शहीद आजाद मन्दिर के रुप में यह स्थापित है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

इसी आजाद पार्क के मध्य में पूर्व-पश्चिम के मुहाने के करीब खेल प्रेमियों का ही नहीं ऐतिहासिक ‘महामना मदन मोहन मालवीय स्टेडियम’ है, जहां क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबाल, टेनिस और न जाने कौन-कौन खेल खिलाड़ियों की पावन स्थली है।

महामना मदन मोहन मालवीय स्टेडियम

आठवें दशक में विश्व प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी सुनील गावस्कर, सलीम दुर्रानी और गुंडप्पा विश्वनाथ की बैटिंग देखने वालों की भीड़ यहां के पेड़ों और छालदीवारी पर जा चढ़ी थीं। उन दिनों क्रिकेट कमेण्टरी रेडियो पर सिर चढ़ कर बोलती थी। उनमें स्कंद गुप्त का क्रिकेट आंखो देखा हाल, सलीम दुर्रानी की समीक्षा (विश्लेषण) और इफ्तिखार की कमेण्टरी को लोग हमेशा याद करते रहेंगे। इसी स्टेडियम की ही देन राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुके मो. कैफ भी है।

सुनील गावस्कर

बैटमिण्टन में विश्व चैम्पियन सुरेश गोयल यहीं इसी महामना परिसर के खिलाड़ी रहे, तो अविनाश भार्गव जैसे लॉन्ग टेनिस के खिलाड़ी की भी अपनी पहचान रही। धावकों में विनोद बहल ने मैराथन दौड़ में अपनी पहचान राष्ट्रीय स्तर तक बनाई थी। कहना यही है कि हर खेल के खिलाड़ी ने यहां अपनी पहचान की दुंदुभी बजाई है। इस मिट्टी को शत्-शत् नमन।

मो. कैफ

अब आईये कुछ चर्चा यहां आजाद पार्क के एक किनारे पर बने हिन्दुस्तानी अकादमी की भी की जाये। यह सभागार हिन्दी सेवियों, शास्त्रीय गायकों, संगीतज्ञों और विख्यात हिन्दी के साहित्यकारों की पहचान स्थली के रुप में बना रहा हैं। यहां कभी डॉ. महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, इलाचन्द जोशी, शंकर दयाल सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. बी.डी.एन. साही, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. राजेन्द्र कुमार, डॉ. राम कुमार वर्मा, लक्ष्मी कान्त वर्मा, डॉ. राम कमल राय की सृजनशीलता का गवाह रहा है और न जाने कौन-कौन कितनी विभूतियों ने यहां बिछाई गई दरी-जाजिम पर बैठकर संगोष्ठी को साकार कराते रहे हैं।

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

यहां रंग कर्मियों में डॉ. सत्यव्रत सिन्हा की पहचान और प्रयाग रंगमंच की प्रस्तुतियों को कौन नकार सकता है, जिसको शम्भू मित्रा, अल्काजी जैसी महान विभूतियां भी नमन करती थी। डॉ. जीवन लाल गुप्त, रामचन्द्र गुप्त, बी.एम. बडोला, सूरी शॉण्डर्स, अमिताभ श्रीवास्तव, उपेन्द्रनाथ अश्क और कौशल्या अश्क, बादल सरकार (सभी लेखक), अनुकूल बनर्जी (प्रस्तोता-रंगकर्मी), मोहित कुमार कौशल शुक्ला जैसों के रंगमंचन कभी न भुलाये जाने वाले यहां होते रहे हैं। शान्ताराम विष्णु कशालकर का गायन हो अथवा गुलवाड़ी परिवार की संगीत सरिता का प्रवाह या फिर योगेन्द्र टिक्कू के अभिनय के साथ मंच गायकी और नौटंकी तो विज्ञापन की दुनिया में भी अपनी पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की। विनोद रस्तोगी की परिकल्पना, मुंशी इतवारी लाल के साथ लेखक नरेश मिश्र, कलाकार कुसुम जुत्शी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

कैलाश गौतम

डॉ. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय की बैठकी घण्टों डॉ. महादेवी, डॉ. राम कुमार वर्मा, गोपेश जी, लक्ष्मीकान्त वर्मा, डॉ. जगदीश गुप्त के साथ याद दिलाती है।

हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

यही हिन्दुस्तानी अकादमी ही वह जगह रही है, जहां कैलाश गौतम ने जब जिम्मेदारी संभाली तो व्यंग्य विधा को न जाने कितने सोपान स्थापित करवाये थे।

हिन्दुस्तानी अकादमी

परन्तु दु:ख है कि आज हिन्दुस्तानी अकादमी के सभागार में फर्श पर दरी जाजिम के ऊपर मसनद लगाकर बैठना गीत-संगीत नाटक साहित्य का आनन्द लेने का जो सुख था। यहां के आधुनिक विशेषज्ञों ने उसका कबाड़ा कर पूरे सभागार को कुर्सियों की चौखट से ढांप दिया है और फूहड़पन का पर्याय बना दिया है। ‘मुक्तांगना’ बगल में बनवा कर  समय को अपना बनाने का प्रयास किया है। साहित्य कला संगीत की मर्यादा टूट चुकी है, क्योंकि मंच ऐसा नहीं रहा कि वह लोगों को आकर्षित कर सके। आज यहीं तक, शेष फिर...

Related Articles