इलाहाबाद कल आज और....'राजा बारा' की शान और पुरोहितों की पहचान

  • Hasnain
  • Monday | 23rd April, 2018
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संक्षेप:

  • पुराने बाशिन्दों की पहचान वाले मोहल्ले अब सिमटने लगे हैं
  • दारागंज मोहल्ले में ठहरे थे महाराजा शिवाजी
  • राजा बनारस और राजा ढिंगवस के अलावा भी कई राजा जुड़े रहे हैं इलाहाबाद से

--वीरेन्द्र मिश्र

अपना इलाहाबाद सचमुच बदल गया है।

अड्डेबाजी जो चौराहों की, पनवाड़ी की दूकान पर लगती थी। वह सिमटकर चाय की दूकानों और रेस्त्रां में पहुंच गई है। आस-पास के शहरों-गांवों और कस्बों से पहुंचे विद्यार्थी अपनी संस्कृति और पहचान के साथ यहां पहुंचते जरूर हैं, किन्तु अब उनमें यहां का संस्कार-संस्कृति असर नहीं करती। वो अपने रंग-ढंग में ही आगे बढ़ते है। चढ़ते हैं और अपने आपको स्वयं गढ़ते भी हैं। अब तो वह जिन्हें पढ़ते जानते रहे हैं। दरअसल उनकी पहचान शहर से गुम हो गई है, तो वे किसको किन हालातों में स्वीकार करें। उन्हें स्वयं भी पता नहीं होता। क्योंकि न तो अब वहां शायर (विश्व प्रसिद्ध) रहे और न ही शायरी सुनने वाले कद्रदान और न बीते काल के कवियों की पहचान रही। न कविता के बोल में स्वयं को स्थापित करने वालों की फेहरिश्त। बिना ज्ञान-विज्ञान मनोरंजन सृजन के सूना-सूना सा लगता है यह शहर। फिर भी ये शहर बदल रहा है। सचमुच बदल रहा है और `हाईटेक` हो रहा है।

ये ऐसा शहर है, जहां अध्यात्म जागृति का सिलसिला प्रात: आरम्भ होता है, तो देर शाम तक कुछ न कुछ अध्यात्म जागृति राग के रूप में होता ही रहता है। अगर हम इसे अध्यात्मवादियों का शहर कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐतिहासिक दस्तावेजों को खंगाले या फिर पुण्य लाभ कमाने वालों की बही-खाते देखें, जो त्रिवेणी में अपना `पाप - संताप` धोने वालों और `प्रताप` बनाने वालें यहां जरुर दिखाई पड़ेेंगे। इस मायने में यह शहर आज भी बदला नहीं। वहीं का वहीं ठहरा हुआ है, किन्तु समयकाल के साथ नये मानदण्डों में जीने वाला भी बना हुआ है। 

इस धरती पर सदियों से बाशिन्दे लोग आते रहे हैं और बसते भी रहे हैं। सबकी अपनी पहचान और अपना कालछन्द रहा है। पुराने बाशिन्दों की पहचान वाले मोहल्ले अब जरूर सिमटने लगे हैं। मसलन अतरसुइया, अहियापुर, कीडगंज, दारागंज, नई बस्ती मोहतसिम गंज ये पांच मोहल्ले ऐसे है, जहां पुरोहितों के शादी-विवाह भी अपने ही परिवार में भाई-बहनों के बीच भी होता आ रहा है। सिर्फ रक्त और कोख का अंतर होता है। मामा-चाचा, ताई, काका मेें कोई अन्तर नहीं माना जाता सब एक हैं। यहां के एक समाज का जीवन संघर्ष और रस्मों-रिवाज एक है और ऐसा है कि परिस्थितियों ने आज उन्हें कहीं पीछे धकेल दिया है, फिर भी `संस्कार` कराने वालों का `संस्कार` क्या से क्या हो गया है, किसी को इससे कोई दरकार नहीं।

वास्तव में ये वासी स्वयं को गंगा माई की कृपा के रूप में मानते-जानते और जीते आ रहे हैं। इनका रहन-सहन, खान-पान, पहनावा ऐसा है कि इनके पुरातन जनों ने जो पहले समृद्ध बनाया था। किन्तु समय काल में सबकुछ बदल रहा है। इनकी पहचान ने सिमटना क्या शुरू किया, ये आज तक सिमटते-सिमटते न जाने कितना सिमट गये हैं। ऐसा लगता है कथा-कहानी बनकर सभी जीने लगे हैं। मसलन धीरे-धीरे पुरोहताई से मोहभंग सा होता जान पड़ने लगा है। हालांकि वक्त जिस पायदान पर चढ़कर, जिनके लिए अपना पांव पखारता आ रहा है। वो सभी स्वयं भी तो काल के साथ `धरोहर` सा बनते जा रहे हैं। हालांकि ऐतिहासिक धरोहरों मेें इस समाज की सम्पन्न, सभ्यता और सलीके की पहचान कभी बनी रही थी। आज भी संगम के किनारे लहराते रंग-बिरंगे झण्डों की आकृतियां ही इनकी पहचान हैं, जिनके पीछे इनकी युगों पुरानी दास्तान छिपी है। न जाने कितने  ही राजा-महाराजा रियासतदार इनके दरवाजे पर पहुंच अपनी परम्परा की गुहार लगाते रहे हैं। सजग चौकस बने रहते रहे हैं।

महाराजा शिवाजी यहां आये, तो दारागंज मोहल्ले में ठहरे थे। महीनों रुके। बाद में अपने पुत्र `संभा` जी को यही रोक आगे की लड़ाई में निकल गये। राजा रीवा हो या फिर राजा बनारस, राजा जयचन्द के वंशज हो अथवा राजा दहिया, शंकरगढ़ ढिंगवस, कालाकांकर, दिलीप पुर पट्टी, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजाओं में कौन-कौन यहां नहीं पहुंचे, परन्तु उनकी पहचान पुरोहितों के झण्डों के रंग भी अब धूमिल हो रहे हैं। जान पड़ता है यहां के `गंगा पुत्रों` के समाज की बाशिन्दगी सिमटते-सिमटते अब सिमट जायेगी! यदि अपनी पहचान के लिए समय के साथ इनमें परिवर्तन नहीं आया, तो स्थितियां आने वाले काल में सबकुछ बदल देगी, क्योंकि यहां की संस्कृतियों में भी बदलाव आता जा रहा है - पाण्डित्यबोध भी धूमिल पड़ रहा है। गंगा की पावनता के साथ जोड़कर इन्हें पुरोहितों को भी अपनी पहचान की जड़ों को सींचना होगा। मिट्टी में झांकना होगा। संगम तट की पहचान पुरोहितों को अपनी संस्कृति के लिए मंत्रोच्चार कर समय के साथ अपनी पहचान को पुन: स्थापित करना होगा।

अब आइये आगे बढ़ते हैं।

राजा बनारस और राजा ढिंगवस के अलावा भी कई राजा इलाहाबाद से जुड़े रहे हैं। राजा हिया। राजा मांडा।  राजा शंकरगढ़ और राजा बारा। जी हां! जिन्हें हम राजा बारा और राजा माण्डा के नाम से जानते रहे हैं, दरअसल वो और कोई नहीं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री रह चुके विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में उत्तरोत्तर वृद्धि में कई कालखण्ड जुड़े रहे हैं। जिनकी हर खण्ड की `अनकही-अनसुनी` बातों का सिलसिला बना रहा है। ठेठ अवधी बोलने वाले राजा `माण्डा` और उनकी माताजी (महारानी साहिबा) उस काल में दोनों `माता-बेटा` की बातें सुनने लायक होती थी। रानी साहिबा सबको बेइंतहा प्यार करती और राजा भी बड़े होकर सौम्य मुस्कुराहट से जनता का दिल जीतते थे।

आज हम बात करेंगे राजा माण्डा यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद इलाहाबाद के लिए किये गये पहले कार्य की। वह था - `बारा` क्षेत्र को पुन: तहसील के रूप में तब्दील कराना। पत्थरीले शंकरगढ़ लोहगरा क्षेत्र से लगे `बारा` में उस दिन जो भीड़ जुटी थी। वहां जय-जयकार हो रही थी `राजा बारा` और `राजा माण्डा` की और तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। दरअसल वह वहां के राजा के वंशज रहे थे।

कोई भी तब उनसे मिल सकता था, बात कर सकता था और अपनी अर्जी देकर कार्य पूरा करवा सकता था।

यह इलाहाबाद शहर के यमुना पार का (दक्षिणी) क्षेत्र था। जिसमें मेजा, माण्डा, करछना, धूरपुर, जारी कांटी बारा, शंकरगढ़, धूरपुर, भीय, चिल्ला-गौहानी, लालापुर, भट्टपुरा, पडुआ, प्रतापपुर, इमिलिया, मछियारी, महेरा, नौढिया तमाम गांव जुड़े थे और गांव-गांव से लोगों की भीड़ तब अपनी मुख्यमंत्री को अपने बीच पाकर गौरवान्वित थी।

अब यह क्षेत्र विकास के कई सोपान चढ़ चुका है, थर्मल पावर तक यहां स्थापित हो चुका है, किन्तु `अनकही-अनसुनी` के अगले पड़ाव में और हम `राजा बारा` `राजा माण्डा` और `राजा शंकरगढ़` कहलाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह की चर्चा आगे बढ़ाते है। जिन्होंने अपने जीवन के संघर्षों में राजा होने के बावजूद आम जनमानस के सेवक के रुप में स्वयं स्थापित किया और भारत के प्रधानमंत्री बनकर उन्होंने कई कालखण्डों को कामयाब बनाया।

पूरा शहर पैदल घूमने वालों में उनका नाम शुमार करता था, तभी तो राजनीति में सफल नायक के रूप में वह स्थापित हुए और देश के प्रधानमंत्री बने थे। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थेे, तो उन्होंने इलाहाबाद शहर की जमुना पार दक्षिणी क्षेत्र के निवासियों के बीच घर-घर पहुंच बनाने की ठानी। वो `माण्डा क्षेत्र, करछना क्षेत्र` और `बारा क्षेत्र` के साथ-साथ `शंकर गढ़, शिवराजपुर मऊ` (तेंदुआरि) तक खुलकर अपनी पहुंच बनाई। अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में उन्होंने सबसे पहले `बारा क्षेत्र` में `बारा तहसील` का लोकार्पण किया था। उस काल में उनकी सर्वत्र `राजा बारा` और `राजा माण्डा` के रूप में ही जय-जयकार होती थी। (ऊपर कुछ वर्णन किया जा चुका है)

एक घटना और याद आ रही है। उस समय आकाशवाणी इलाहाबाद का सर्वत्र दबदबा और पहचान थी। कैलाश गौतम जैसे व्यंग्यकार कवरेज के लिए, आकाशवाणी के तकनीक सहायक के.के. वार्ष्णेय का खुलकर तब सहयोग मिला करता था। जैसे ही मुख्यमंत्री के रूप में बारा (वाराह) क्षेत्र की सभा सम्पन्न हुयी, वह हेलिकॉप्टर से लालापुर इमिलियन क्षेत्र के लिए उड़े, उसी समय आकाशवाणी की टीम भी अपनी `महिन्द्रा जीप` से लालापुर की ओर कवरेज के लिए दौड़ पड़ी थी। कैसा अजब संयोग था कि जब मुख्यमंत्री `लालापुर, इमलिया` और `पाण्डुआ प्रतापपुर` की बनी सड़क का शुभारम्भ करने के लिए पहुंचे, हेलिकॉप्टर से उतरे और मंच पर पहुंचकर वहां की जनता को सम्बोधित करने के लिए खड़े हुये थे कि ठीक उसी समय वह रिकॉर्डिंग टीम भी 25 किलोमीटर की यात्रा पूरी करके पहुंच गई थी।

यह सम्भवत: 1979-80 की बात है। मंच से तब उस टीम को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देखकर बेहद खुशी जाहिर की थी और (रिकॉर्डिंग चल ही रही थी) उन्होंने मंच से पूरी आकाशवाणी इलाहाबाद के (कैलाश गौतम, के.के. वार्ष्णेय) के कुशल तत्पर्ता की सराहना की थी और कहा था - ये टीम अभी बारा (वाराह) क्षेत्र में थी और हमारे आने के साथ यहां लालापुर भी पहुंच गई। अपने आप में इलाहाबाद की मिट्टी और कर्मठतों की ये पहचान का प्रतीक है। आज उनकी यादें बाकी हैं, किन्तु विश्वनाथ प्रताप सिंह की सन्ततियों में से एक ने इलाहाबाद सिविल लाइन्स में पहचान को शहर की पहचान के साथ हाईटेक आयाम से जोड़ा है, `मेगा मॉल` की परिकल्पना को साकार कर दिखाया हैं। सुभाष चौराहे की पहचान भी बदल गई है। अब पूरी सिविल लाइन्स ही बदल रहा है। हाईटेक हो गया है।

के.के. आकाशवाणी के तकनीकी सहायक की यात्रा ने कई पड़ाव पार करते हुये, आज वरिष्ठ अभियन्ता बनकर वह दूरदर्शन की तकनीकी जिम्मेदारी आगे बढ़ा रहे है। उनकी चर्चा एक साधक के रूप में की जानी चाहिए क्योंकि बीते 25 वर्षों में वह `एक पैर पर` अनवरत चलते हुये (दूसरा पांव विषम बीमारी और असाध्य स्थिति में काटे जाने के बाद) साधनारत अपने काम को आंजम देते आ रहे हैं।

`बैसाखी से आशिकी कूबत बेमिसाल। खोया बहुत कुछ किन्तु! रहा नहीं मलाल।`

आकाशवाणी का नया स्टूडियो हो अथवा दूरदर्शन का प्रसारण केन्द्र हो या फिर इलाहाबाद का दूरदर्शन का प्रोडक्शन प्रसारण स्टेशन हो, के.के. वार्ष्णेय की साधना निरन्तर तकनीकी पक्षों की विशेषता के साथ बढ़ती रही है। गीत-संगीत, कथा-संवाद, डिजाइन और शहर का अनुसंधान इनकी उंगली के पोरों में समाया है। समन्वय में उनकी तत्र्पता का कोई जवाब नहीं और अच्छी बात ये भी रही है कि `के.के.` वहीं इलाहाबाद पॉलीटेक्निक से शिक्षा के मानदण्डों का ज्ञान लेकर आगे बढ़े हैं, तो अनवरत अपनी साधना के साथ तरन्नुम में अपने काम को संचारित करने में भी सक्रिय रहते रहें है। उम्र का पड़ाव अथवा जीवन का `विषम संघर्ष` उनके सामने कभी आड़े नहीं आया। गजब की ऊर्जा से भरा हुआ, उन्हें हमेशा देखा-जाना और सुनकर पहचाना भी जा सकता है।

ये चंद उदाहरण है `अनकही-अनसुनी` के पाठकों के लिए, इलाहाबाद की मिट्टी में साधना करने वाले की जो निरंतर आगे बढ़ती रहती है और भी न जाने कितने मनीषी, विद्वान हस्ताक्षर है अपने-अपने क्षेत्र में। उनकी भी चर्चा हम आगे करते रहेंगे।

नोट: इलाहाबाद अनकही-अनसुनी का ये अंक पहले सीजन का अंतिम अंक हैं। अब हम इसका दूसरा सीजन लॉन्च करेंगे, जिसकी जानकारी आपको जल्द दी जाएगी। आप सभी के प्यार और सहयोग के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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