अनकही-अनसुनीः लखनऊ के किस नवाब की सौगात है आलू-गोश्त बिरयानी

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  • Saturday | 31st March, 2018
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संक्षेप:

  • वाजिद अली शाह की सौगात है गोश्त–आलू बिरयानी
  • शानों शौकत के लिए जाने जाते थे वाजिद अली शाह
  • वाजिद अली शाह ने घुटवा कबाब का भी इज़ात किया था

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः 13 मई 1956 के दिन अवध के ताजदार वाजिद अली शाह कोलकाता पहुंचे थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनको अपनी रियासत से बेदखल कर के कोलकाता से चार किलोमीटर दूर गार्डन रीच नाम की जगह पर रहने के लिये कई कोठियां दे दी थी। उन कोठियों के साथ एक छोटा सा मिट्टी का टीला था। इस टीले के नाम पर नवाब साहब की रिहाइश का नाम मटिया बुर्ज पड़ा था। करीब तीस साल तक वाजिद अली शाह यहां रहे थे।

कहते है वाजिद अली शाह के साथ लगभग 7000 लोग लखनऊ से आये थे। अपने ताममं कुंबे के आलावा वाजिद अली शाह सैकड़ों नौकर भी अपने साथ लाये थे, जिनमें दर्जनों खानसामें भी थे। वाजिद अली शाह को संगीत से ले कर नृत्य जैसी कलाओं का विशेष शौक था और लखनऊ के परी खाने से गाने वाली और नाचने वालियां भी साथ चली आई थी। शौक़ीन तबीयत होने के बावजूद वाजिद अली शाह पक्के नमाज़ी थे। उनके बारे में कहां जाता था कि उन्होंने ताउम्र बेनागा पांचों वक़्त की नमाज़ अदा की थी और रोजे रखने में कभी भी कोताही नहीं बरती थी।

अवध की बेपन्हा दौलत के मालिक होने के बाद जब वो कोलकाता आये तो कंपनी बहादुर ने उनको सिर्फ एक लाख रुपये महीने की पेंशन मंज़ूर की थी। बड़ा लाव लश्कर होने की वजह से वाजिद अली शाह पर तंगी के दिन आने लगे और सबसे पहले कटौती की गाज उनके खान–पान पर गिरी थी। इस कटौती से शुरू हुआ एक सिलसिला जिसे अवधी–बंगाली मुगलई विरासत कहा जा सकता है।

लखनऊ बिरयानी सबसे खास बिरयानी थी। वैसे हैदराबादी, रामपुरी, दिल्ली और मुरादाबाद की बिरयानी भी मशहूर थी पर लखनऊ का जयका बेहद नफ़ीस था। अमूमन लखनवी बिरयानी परसते हुये ध्यान रखा जाता था कि चावल कम हो और बोटी ज्यादा। मोटे तौर से, चार बोटियों के साथ दो करछी चावल परोसा जाता था।

पर मटियाबुर्ज में नवाब साहब की इतनी हैसियत नहीं बची थी कि वो अपने लंबे चौड़े कुंबे के लिये रोजाना इतने सारे गोश्त का इंतिजाम कर सके। बावर्चियों को हिदायत दी गयी कि वो ऐसा तरीका निकाले जिससे बिरयानी में गोश्त कम लगे पर उसका लुफ्त कम न हो।

उस ज़माने में आलू हिंदुस्तान में नया-नया आया था। अंग्रेजों ने देहरादून में आलू उगाना शुरू किया था और पैदावार बढ़ाने के लिये कई राज्यों में किसानों को प्रोत्साहित कर रहे थे। नवाब वाजिद अली शाह के बावर्चियों ने आलू के साथ गोश्त बनाने का प्रयोग शुरू किया और जल्द ही उन्होंने गोश्त–आलू की बिरयानी की इजात कर डाली। आज के कोलकत्ता में बिरयानी में आलू डालने की रिवायत मटिया बुर्ज से शुरू हुयी थी।        

बिरयानी में आलू डालने के लिए पहले पूरे आलू को छीला जाता था, उसको छुरी से हलके-हलके गोदा जाता था और फिर तेज़ गर्म घी में आधा मिनट तला जाता था। इसके बाद तले हुये आलू को नमक वाले उबलते हुये पानी में तब तक के लिये डाल दिया जाता था जब तक कि वो पूरी तरह से पक न जाये। उन पर हल्का सुन्हेरा रंग लाने के लिये, चुटकी भर केसर डाल दी जाती थी। बिरयानी की तह लगाते समय गोश्त कोरमे के साथ आलू भी लगा दिये जाते थे।

ज्यादातर बिरयानी असली घी और गोश्त की चर्बी में पकती थी पर कलकत्ता में सरसों के तेल का इस्तिमाल किया जाता था। असली घी से वो मंहगा भी कम था पर उसकी खुशबू एकदम अलग थी। बवार्चियों ने उसकी भी तोड़ निकाल ली थी। वो तेल को पहले खूब उबलते थे जिससे उसकी महक लगभग खत्म हो जाये और फिर उसे बिरयानी में डाल देते थे। आलसी घी का स्वाद मुंह में लाने के लिये वो आखिर में थोड़ा सा घी उस पर छिड़क देते थे।

अत्तर और केवड़ा भी आलू बिरयानी में डाला जाता था। इनसे सरसों की महक पूरी तरह से ख़त्म हो जाती थी और खुशनुमा खुशबू बिरयानी में से आने लगती थी।

आम तौर पर अवध में मछली खाने का चलन कम था पर वाजिद अली शाह के मटिया बुर्ज आने पर मछली खाना एक मजबूरी बन गयी थी। इस मजबूरी के चलते, खानसामों ने घुटवा कबाब का इज़ात किया था। घुटवा कबाब बंगाल की मशहूर हिल्सा मछली से बनते थे। उसे उबला जाता था और फिर उसके सारे काटे मेहनत से निकाल दिये जाते थे। मछली के मॉस को हल्का-सा पीस कर घुटवा कबाब तैयार किये जाते थे।

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