अनकही-अनसुनीः लखनऊ यूनिवर्सिटी की दास्तान

  • Sonu
  • Saturday | 8th July, 2017
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संक्षेप:

  • लखनऊ यूनिवर्सिटी की अनूठी नवाबी पहचान
  • 1920 में हुई थी यूनिवर्सिटी की स्थापना
  • शंकर दयाल शर्मा यहीं से पढ़ कर बने राष्ट्रपति

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः हज़रतगंज से चौक की तरफ निकलते ही नवाब सआदत अली खान के मक़बरे के सामने एक बड़ा बाग हुआ करता था। 1857 की आज़ादी की जग का एलान बेगम हज़रत महल ने यही से किया था। उनके शौहर नवाब वाजिद अली शाह को पहले ही अंग्रेज़ों ने नवाबियत से हटा कर कलकत्ता रवाना कर दिया था। पार्क की दायी ओर से एक सड़क जाती थी जो कि क्लार्क्स अवध होटल के बग़ल से होते हुए गोमती नदी पर बने मंकी ब्रिज पर चढ़ जाती थी। यह पुल  सीधा लखनऊ यूनिवर्सिटी के भव्य कैंपस में खुलता था। 1860 की बाढ़ के बाद मंकी ब्रिज कमजोर हो गया था और उसके बगल में ही आज का हनुमान सेतु बना था। हनुमान सेतु के बनते ही मंकी ब्रिज गिरा दिया गया था।

साठ के दशक से पहले लखनऊ यूनिवर्सिटी जाने का रास्ता यही पुल था। इससे उतरते ही यूनिवर्सिटी शुरू हो जाती थी। एक तरफ आर्ट्स कॉलेज और वाईस चांसलर का ऑफिस था और दूसरी तरफ छात्र संघ का कार्यालय। इन दोनों के बीच चौड़ी सड़क थी जिसके दोनों तरफ घने पेड़ लगे थे। 200 मीटर लम्बे रास्ते को पार कर आता था कैनिंग कालेज का परिसर यानि आज का आर्ट्स फैकल्टी की अवधि स्टाइल में बनी दो मंज़िला ईमारत। लगभग उसी समय इस ईमारत के सामने और क्रीड़ा मैदान से लगा केशियर ऑफिस बना था जिसकी छत अमूमन छात्र रैलीओ के दौरान मंच की तरह की जाती थी।

लखनऊ यूनिवर्सिटी की स्थापना 1920 में हुई थी और इसमें अध्यापन का कार्यक्रम 17 जुलाई 1921 को विधिवत शुरू हुआ था।  उस समय यूनिवर्सिटी में सिर्फ तीन कालेज थे। कैनिंग कालेज, इसाबेला थोबोर्न कालेज और किंग जॉर्ज` मेडिकल कालेज। यूनिवर्सिटी को बनाने में यूनाइटेड प्रोविंस के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर हारकोर्ट बटलर ने सूत्रदार की एहम  भूमिका निभाई थी। राजा साहेब मेहमूदाबाद और जहांगीराबाद ने एक-एक लाख रुपये यूनिवर्सिटी बनाने के लिए दान दिए थे। उनके कहने पर अवध के तालुक़्क़ेदारों ने मिल कर तीस लाख रुपये का योगदान भी दिया था।

आर्ट्स फैकल्टी के ठीक सामने साइंस फैकल्टी की बिल्डिंग है और उसके बग़ल में ही थी लाल बारादरी (जो कि बाद में स्टाफ क्लब में तब्दील हो गयी)  उसके सामने फुव्वारों से जड़ा बाग है। इस बाग़ में टैगोर लाइब्रेरी की आलीशान ईमारत  कायम है। 

वैसे इलाहबाद यूनिवर्सिटी उस जमाने में देश की शान थी। उसको ऑक्सफ़ोर्ड ऑफ़ द ईस्ट कहा जाता था। इलाहबाद के साये  में होने के बाबजूद, लखनऊ यूनिवर्सिटी की अपनी  ही नवाबी थी। इसके शुरुवाती दौर के छात्र शंकर दयाल शर्मा भारत राष्ट्रपति बने और बीपी कोइराला नेपाल के प्रधानमंत्री रहे। तमाम शख्सियतें ऐसी है जिन्होंने देश विदेश में अपनी उपलब्धियों की वजह से खूब नाम कमाया। चिमनयानंद सरस्वती, सुरजीत सिंह बरनाला, कुर्रतुलऐन हैदर, ईशा बसंत जोशी, सज्जाद ज़हीर, अत्तिया हुसैन, कवि प्रदीप, राजा दिनेश सिंह, वाईएस परमार, अजित सिंह, हरीश रावत, हितेश्वर सैकिया, डिंपल यादव, सुरेश रैना, विनोद मेहता आदि लखनऊ यूनिवर्सिटी की ही पैदाइश है।

लखनऊ यूनिवर्सिटी की अनूठी नवाबी पहचान थी पर सत्तर के दशक में वो एकदम से बदल गयी। छात्र आंदोलन के नाम पर गुंडागर्दी होने लगी। पढाई लिखाई का जगह आराजकता हावी हो गयी। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व  में देश भर में हो रही सम्पूर्ण क्रांति की लपेट में यूनिवर्सिटी भी आ गयी और उसका फ़ायदा गुंडा-छात्र नेताओं ने खूब उठाया।

1975 में जेपी छात्रों की सभा सम्बोदित करने यूनिवर्सिटी आये। हज़ारों की संख्या में छात्र और आम लोग उनको सुनने के लिए यूनिवर्सिटी ग्राउन्ड में  जमा हुए थे। केशियर ऑफिस की छत से उन्होंने सभा को सम्बोधित किया था। भीड़ का उत्साह देख कर वो बहुत खुश हुए थे। पर गुंडा-नेताओं ने उनको भी नहीं बक्शा था। कोई उनकी चप्पल ले गया तो कई और उनके बगल में घुसने में ऐसे लगे की उनका कुर्ता  ही फाड़  डाला। जेपी  इस व्यवहार से बेहद परेशान हुए थे। पर इमरजेंसी के दौरान अंडर ग्राउंड मूवमेंट चला था और इसका विरोध करते हुए कई छात्र गिरफ्तार हुए थे।

लखनऊ यूनिवर्सिटी पर शायद ग्रहण लगा हुआ है। उसकी डिग्री की बहुत सालों से शायद कोई कीमत नहीं। पर उसकी पुरानी इमारतों की गिनती आज भी वास्तु शिल्प की नायब नज़ीरों  में की जाती है।

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