अनकही-अनसुनीः नीलम जहां की खूबसूरती के दीवाने थे लखनऊ के नवाब

  • Sonu
  • Saturday | 25th November, 2017
  • local
संक्षेप:

  • नीलम की फरमाइश टालने की हिम्मत नवाबों में नहीं थी
  • नीलम की सोहबत का लुत्फ गिने-चुने लोग ही उठाते थे
  • नौजवानों को परिवार वाले ही भेजते थे तवायफ़ों के पास

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः नीलम जहां इस कदर ख़ूबसूरत थी कि उन पर एक नज़र पड़ते ही लोग दीवाने हो जाते थे। लंबा, छरेरा जिस्म, बड़ी-बड़ी बाते करती आखें और सुर्ख तराशे हुए होंठ उनकी मोती जैसे रंग पर ऐसे दमकते थे मनो सरापा हुस्न भी उन्हें देख कर कायल हो गया हो। कहा जाता था कि उनकी त्वचा इतनी साफ़ और पारदर्शी थी कि जब पान का लाल रस उनके गले से उतरता था तो पूरा गला गुलाबी हो जाता था। अकबरी दरवाजे से आगे एक चोड़ी सी गली में उनकी कोठी थी। पर हर कोई उसमें नहीं जा सकता था। लखनऊ के सिर्फ आधा दर्जन लोग ही उनके सामने पेश हो सकते थे। उनकी गायकी और उनकी सोहबत का लुत्फ उठा सकते थे।

शायद नीलम जहां लखनऊ की आखिरी कुलीन तवायफ थी। 1960 से लेकर 1970 के मध्य तक वो काफी मशहूर हुआ करती थी। उनके सबसे बड़े दीवाने शीशमहल के एक नवाबजादे हुआ करते थे। नीलम जहां भी उन्हें काफी पसंद किया करती थी और अक्सर उनके साथ घुमने फिरने बॉम्बे, दिल्ली और कलकत्ता जैसे शहरों में जाया करती थी। हुआ यू कि एक बार नवाब साहब उन्हें बम्बई ले गये जहां नीलम जहां को नीलम का हार पसंद आ गया। नवाब साहब वैसे तो पैसे वाले थे पर उनकी माली हालत दिन ब दिन खस्ता होती जा रही थी। अंठी में इतने पैसे नहीं थे कि हार खरीद सके पर नीलम जहां की फरमाइश टालने की कुव्वत भी नहीं थी। उन्होंने हार बुक करा दिया और फिर ताबड़तोड़ लखनऊ में अपने एक कारिंदे को टेलीग्राम भेजा। हुक्म था कि मलिहाबाद वाला आम का बाग बेच दो और अगली ट्रेन से लाख रुपये ले कर आ जाओं।

वैसे लखनऊ 19वीं सदी से ले कर 20वीं सदी के मध्य तक अपनी तवायफों के लिये जाना जाता था। उठने बैठने का सलीका सीखने के लिये नौजवानों को तवायफ़ के पास भेजा जाता था। तामील महंगी जरुर थी पर उसका असर लखनऊ की विशेष तहज़ीब पर आज भी देखा जा सकता है। नीलम जहां जैसी तवायफे महंगे गहने अपने चाहने वालों से पेश करवा लेती थी पर उनकी सौबत भी लाखों में एक थी। ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा के साथ मुजरा हो या फिर देश प्रदेश–देश की राजनीति, उनकी पकड़ सब पर अच्छी थी। कोई भी मसला हो, नीलम जहां की तरह, वो पूरी बात सुन कर सटीक राय दिया करती थी। शायद इसीलिये लखनऊ के नफ़ीस कद्रदान उनसे रिश्ता बनाने के लिये बेताब रहते थे।

ज्यादातर तवायफे अकबरी गेट के आसपास रहती थी। जो बेहद ख़ास थी उनकी कोठिया न्यू हैदराबाद, दिलकुशा, ठाकुर गंज, मूसा बाग आदि में हुआ करती थी। अकबरी गेट के सामने चावल वाली गली भी है। जहां पर जिस्म फ़रोशी के कोठे थे। पाटा नाला चौकी के बगल से एक गली जाती है जिसमें टीकमगढ के राजा साहब की खास तवायफ़ रोशन बाई आ कर बस गयी थी। उनकी कोठी की पहली मंजिल पर शीशों से जड़ा एक बड़ा हॉल था जिसमें वो मुजरा किया करती थी। रोशन बाई भी बेहद ख़ूबसूरत थी और उनकी आदायगी बेमिसाल थी। 1975 तक उन्होंने मुजरा किया था और फिर उनकी सिखायी हुई लड़किया किया करती थी।

लखनऊ में इन नाज़नीनों को बड़ी इज्ज़त की नज़र से देखा जाता था। 1950 और 1960 के दशक तक होली के दिन चौक में रंग खेलने के बाद दोपहर में जलूस निकाला जाता था जो चावल वाली गली में जाता था। इस जलूस में लखनऊ के तामम जाने माने लोग हाथी, घोड़ों, गधों, बैल गाडियों आदि पर सवार होकर तवायफों और वैश्याओं के साथ होली खेलने जाते थे। शहर का सबसे बड़ा व्यक्ति इन युवतियों को तिलक लगा कर सम्मानित करता था और फिर सब मिल कर होली खेलते थे।

अक्सर तवायफों से रिश्ते लंबे दौर के हुआ करते थे। जो शख्स उनसे जुड़ता था वो अपनी पसंदीदा लड़की के आलावा उसके पूरे कुनबे से भी जुड़ता था। जब भी शहर से बाहर जाना होता था जैसे गर्मियों में मसूरी या नैनीताल तो सारा कुनबा साथ जाता था और उसका सारा खर्च वो ही उठता था। तवायफों और उनके दीवानों के बीच लंबे समय के करार नामे हुआ करते थे जिसके दौरान खर्च के एवज में तवायफ सिर्फ़ एक शख्स से बंध जाती थी।  

पर 1980 के बाद से लखनऊ का मिजाज़ बदलने लगा था। नवाब, राजा, तालुकेदार, जमींदार ख़त्म होने लगे थे। नयी पीढ़ी के पास अनाब-शनाब पैसा भी नहीं बचा था। साथ ही मुजरा सुनने की जगह लोग फ़िल्मी गानों पर डांस पसंद करने लगे थे। फिर धीरे-धीरे नजाकत और नफ़ासत की जगह हुललड़ बाजों ने ले ली। उस समय की सरकारे तथाकथित स्वछता अभियान चलाने में भी लग गयी जिसकी वजह से कोठे और गलिया उजाड़ने लगी। 1980 के अंत तक लखनऊ की शान और उसकी अनूठी विरासत इतिहास की गोद में समा गयी थी।

Related Articles