अनकही-अनसुनीः लखनऊ के दिलकुशा कोठी की कहानी

  • Sonu
  • Saturday | 9th December, 2017
  • local
संक्षेप:

  • ऐतिहासिक इमारतों में से एक है कोठी
  • अंग्रेजी आर्किटेक्ट का उदाहरण है कोठी
  • 1800 में ब्रिटिश रेजिडेंट ने बनवाई थी कोठी

By: अश्विनी भटनागर

लखनऊः आई एलन सीली की प्रसिद्ध किताब टोटरनामा की शुरुवात एक ऐसे वाक्ये से होती है जिसमें एक अंग्रेज़ बड़े से गुब्बारे से लगी एक टोकरी में बैठे कर उडान भरेने की असफल कोशिश करता है।

टोटर साहिब का झक्की सा किरदार लेखक इसी घटना से स्थापित कर देता है। सीली खुद लखनऊ से है और अपने लेखन के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्म श्री से नवाजे जा चुके है। ला मार्टिनियर स्कूल के वो विद्यार्थी रहे है और उपन्यास में उन्होंने इस स्कूल और लखनऊ के मिजाज़ का बखूबी चित्रण किया है।

रोचक बात यह है कि सीली न जिस वाक्ये का ज़िक्र किया है वो वास्तव में एक ऐतिहासिक घटना थी और ला मार्टिनियर स्कूल के बगल में स्थित दिलकुशा पैलेस और गार्डन में हुई थी। किस्सा 1830 का है जब “एक अंग्रेज़” ने टोकरी में गुबारा फिट कर के उड़ने की कोशिश की थी। तत्कालीन शासक नासिर उद्दीन हैदर और उनके दरबारी इसके चश्मदीद गवाह थे। पर यह एक ‘अंग्रेज़’ का कारनामा था या फिर फ़्रांसीसी सैनिक क्लौड मार्टिन का था कहना मुश्किल है। मार्टिन दिलकुशा के पैलेस के बगल में अपनी कोठी में रहते थे (आज का ला मार्टिनियर स्कूल) और इस तरह के उत्साही प्रदर्शन करते रहते थे।

दिलकुशा आज अपनी सरकारी आवासों के लिये जाना जाता है। प्रशासनिक सेवा के उच्च अधिकारी, मत्री आदि जैसे वीईपी वहां पर रहते हैं और उनके सरकारी दबदबे के चलते एक ज़माने की आलीशान कोठी साइड लाइन सी हो गयी है। पर आज भी इसकी भव्यता की रूह जिंदा है। 1857 में हुई आज़ादी की जंग में भी इसकी अहम भूमिका थी।

दिलकुशा कोठी 1800 में ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर गोर ओउसेले ने गोमती नदी के तट पर बनवाई थी। वो तत्कालीन नवाब सआदत अली खान के दोस्त थे। शुरू में यह एक शिकार गृह था जिसे नवाब साहब इस्तिमाल करते थे। बाद में यह उनका ग्रीष्म निवास बन गया था। दिलकुशा कोठी की ख़ासियत यह थी कि वो अंग्रजी बारोक स्टाइल में बनी थी जिसकी चौड़ाई से ज्यादा ऊंचाई थी। उसके चारों तरफ सुंदर बगीचे थे जिनमें रूमानी होने के लिये ज़रूरी व्यवस्था थी। कोठी इतनी शानदार थी कि प्रसिद्ध लेखक ईएम फोरस्टर ने अपने उपन्यास अ पैसेज टू इंडिया में अपने किरदारों की कोठी का नाम दिलकुशा रखा था और उसका विवरण मौजूदा कोठी से मिलता जुलता है।

नामी ब्रिटिश अदाकार मैरी टेलर ने जब दिलकुशा कोठी को देखा था तो इतनी भाव विभोर हो गयी थी कि उन्होंने अपने घर का नाम दिलकुश रख दिया था। उन्होंने कहा था, “जिस क्षण से मैंने हिंदुस्तान में दिलकुशा कोठी देखी है तभी से यह मेरे सपना बन गया है कि मैं अपने घर को भी ऐसा ही बनाऊ और उसका नाम दिलकुशा रखूं।”
1857 की लड़ाई की शुरुवात में दिलकुशा कोठी बेगम हज़रत महल की फौज के कब्जे में थी पर अंग्रेज़ फ़ौज ने इसे “बागियों” से झटक लिया था। सर कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अंग्रेज़ फौजे इस पर काबिज हो गयी थी जिसके फलस्वरूप “राष्ट्रीय” फौजों ने इस पर जम कर गोले दागे थे। प्रसिद्ध अंग्रेज़ जनरल सर हेनरी लॉरेंस (जिनके नाम पर लखनऊ का आवासीय इलाका लॉरेंस टेरेस है) की भी मौत दिलकुशा कोठी की जंग में ही हुई थी।

अमुमन यह कहा जाता है कि 1857 की भीषण बमबारी की वजह से दिलकुशा कोठी बुरी तरह से शतिग्रस्त हो गयी थी और आज हम जो भग्नावशेष देखते है वो उसी का नतीजा है। पर 1857 में ली गयी एक फोटो में कोठी शतिग्रस्त नहीं दिखती है। 1898 में ली गयी दूसरी फोटो में यह बुरे हाल में दिखती है। इससे यह निष्कर्ष निकला जा सकता है कि दिलकुशा पैलेस– कोठी को व्यापक नुकसान 1857 में नहीं पर उसके बाद हुआ था।

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