Prayagraj News: गंगा-यमुना में सात प्रतिशत बढ़ीं देसी मछलियां, इस विधि से मिली सफलता

मृत्युंजय मिश्र, प्रयागराज।

गंगा नदी तंत्र (गंगा, यमुना, सरयू सहित सभी गंगा की सहायक नदियां) के पारस्थितिकी तंत्र में सुधार को दर्शाती यह एक आशाजनक खबर है।गंगा-यमुना के प्रदूषित जल और जीवट विदेशी प्रजातियों कामन कार्प और तिलापिया के प्रभाव के आगे घुटने टेकने वाली आइएमसी यानी देसी मतस्य प्रजातियां रोहू, कतला और नैन फिर से खड़ी हो रही हैं।

केंद्रीय अंतरस्थलीय मात्सयिकी अनुसंधान केंद्र (सिफरी) प्रयागराज क्षेत्रीय केंद्र के अध्ययन में देसी प्रजातियों की संख्या में छह से सात गुणा वृद्धि के प्रमाण मिले हैं।

विज्ञानी इसके लिए आठ वर्षों से निरंतर जारी रैचिंग कार्यक्रम और जल प्रदूषण में आई गिरावट को बड़ी वजह मानते हैं।

इसे भी पढ़ें- जेल में बंद बदमाश ने कार्रवाई से बचने के लिए रची ऐसी साजिश, जानकर पुलिस के उड़े होश अपने लजीज स्वाद और पोषक गुणों से भरपूर देशी मत्स्य प्रजातियां रोहू, कतला और नैन गंगा नदी की मूल मछलियां हैं, जो हरिद्वार से गंगासागर तक 2200 किलोमीटर लंबे गंगा स्ट्रेच में पाई जाती है।

60 के दशक में यह गंगा-यमुना पर राज करने वाली इन देसी प्रजातियों का शेयर 50 से 60 प्रतिशत था, जो बाद में सिमटकर 10 प्रतिशत रह गया था। सिफरी प्रयागराज क्षेत्रीय केंद्र के प्रमुख डा. डीनएन झा बताते हैं कि मछलियों की संख्या बढ़ाने के लिए 2015-16 में राष्ट्रीय रैंचिंग कार्यक्रम की शुरूआत हुई और दूसरी ओर नमामि गंगा के तहत पानी की गुणवत्ता भी सुधरी।

इससे देसी प्रजातियों के लिए पनपने का बेहतर माहौल मिला। इसे भी पढ़ें-गोरखपुर का यह नया स्‍टेशन यात्रियों के लिए बनकर तैयार, कल से चलेंगी ट्रेनें मछलियों की संख्या का पता लगाने के लिए सिफरी के निदेशक डा. बीके दास के निर्देशन में अध्ययन की शुरूआत की गई।

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