यूपी के इन शहरों में गंगा-यमुना के पानी में घटी ऑक्सीजन, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान

दाेनों नदियों की यह हकीकत इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों और शोधार्थियों के अध्ययन में सामने आई है।

यह शोध अंतराष्ट्रीय जर्नल वाटर सप्लाइ में प्रकाशित हुआ है। इसे भी पढ़ें- यूपी रोडवेज में आने वाली है चालकों की बंपर भर्ती, इन जिलों के लिए होगा चयन दोनों नदियों पोषक तत्व भार, यूट्रोफिकेशन के खतरे का पता लगाने के लिए पर्यावरण विज्ञान केंद्र की शोध छात्रा कृति वर्मा ने सुपरवाइजर डा. पवन कुमार झा के निर्देशन शोध शुरू किया।

गंगा नदी के लिए कानपुर, प्रयागराज और वाराणसी से तथा यमुना नदी के लिए आगरा, मथुरा और प्रयागराज में गर्मी के दिनों में 36 स्थानों से पानी के नमूने लिए गए। अध्ययन में सामने आया कि यमुना में फास्फेट की मात्रा 115 गुना और गंगा में 26 गुना अधिक है।

नाइट्रेट की मात्रा गंगा में मानक से कम रही पर यमुना में बढ़ी रही।

गंगा में जहां यूट्रोफिक स्थितियां पाई गई तो यमुना में सुपर यूट्रोफिक स्थितियां बन गई हैं। इसे भी पढ़ें-यूपी के इस जिले में 86 गांवों में रिक्त पंचायत सहायक पद पर तैनाती शुरू, 30 जून तक आप भी कर सकते हैं आवेदन पर्यावरण विज्ञान केंद्र के समन्वयक डा. उमेश कुमार सिंह बताते हैं बिना शोधन के सीवर नदियों में बहाने के कारण नाइट्रेट और फास्फेट की मात्रा बढ़ी है, जो नदी के इको सिस्टम के लिए खतरनाक है।

ऐसे में नदियों को बचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा एसटीपी लगाने होंगे। आक्सीजन की कमी में गंगा से ज्यादा बदहाल है यमुना अध्ययन निष्कर्ष के अनुसार पानी घुलित आक्सीजन की मात्रा छह मिलीग्राम प्रति लीटर से कम नहीं होनी चाहिये पर यह गंगा में 3.6 से 5.2 और यमुना में 3.7 से 4.7 मिलीग्राम प्रति लीटर ही मिली है।

शैवाल वृद्धि के लिए जिम्मेदार फास्फेट की मात्रा अधिकतम 0.01 मिलीग्राम (एमजी) प्रति लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए पर यह गंगा में यह 0.02 से लेकर 0.26 तथा यमुना में 0.55 से लेकर 1.15 एमजी है।वहीं नाइट्रेट की मात्रा 45 एमजी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।गंगा में यह 13.6 से 29.8 एमजी और यमुना में 30.68 से 61.29 एमजी प्रति लीटर पाई गई है। नाइट्रेट-फास्फेट की अधिक मात्रा से यमुना सर्वाधिक खतरे में नाइट्रेट और फास्फेट एल्गी (शैवाल) की वृद्धि के लिए जिम्मेदार है।

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