भीड़ हिंसा की शिकार पुलिस, आखिर क्यों?

संक्षेप:

  • भीड़ हिंसा की शिकार पुलिस क्यों?
  • पुलिस के लिये अविश्वास आज भी जारी
  • मित्र पुलिस को अपना शत्रु क्यों समझने लगी है जनता?

By: मदन मोहन शुक्ला

आजादी मिलने के 72 साल बाद भी क्यों भारतीय पुलिस का खाकी वर्दी वाला सिपाही सिर्फ भय और भ्रष्टाचार की एक भौडी तस्वीर लगता है? उस पर कोई विश्वास नहीं करता, कोई उससे दोस्ती नहीं करता वो दिमागी स्तर पर रुग्ण और क्रुद्ध लगता है। जलालत की जिन्दगी जीता है और दूसरों को जलील करने में मजा लेने का आदी हो जाता है।

फ्रांसीसी पुलिस के बारे में (फ्रेंच हैन्ड बुक ऑफ पुलिस) में लिखा है कि पुलिस के अलावा और कोई संस्थान ऐसा नहीं है जो जनमन मे इतना अविश्वास, विद्वेषया और वास्तविक घृणा जगाता हो। आश्चर्य नहीं कि भारतीय पुलिस पर भी यह बात सौ फीसदी सही न लागू होती हो?
21वीं शताब्दी की इस पुलिस की छवि 1902-03 की फ्रेजर कमीशन की रिपोर्ट से हूबहू आज बिना किसी सुधार के दिखाई देती है। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के 22 सितम्बर 2006 के ऐतिहासिक निर्णय जो पुलिस सुधार पर दिया जिसमें केन्द्रीय सुधार और राज्य सरकारों को पुलिस सुधारों को शुरू करने के लिये व्यावहारिक तन्त्र डालने के साथ निर्देशों के एक समूह का अनुपालन करने का निर्देश दिया वह थे ‘‘पुलिस बल कुशल से बहुत दूर है यह प्रशिक्षण और संगठन में दोषपूर्ण है यह अपर्याप्त रूप में पर्यवेक्षित है, इसे आम तौर पर भ्रष्ट और दमनकारी माना जाता है। और यह लोगों के आत्म विश्वास और सौहार्दपूर्ण सहयोग को सुरक्षित करने में पूरी तरह असफल रहा है’’।

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1861 का पुलिस अधिनियम अभी भी गाइड और हमारे पुलिस सिस्टम को नियंत्रित करता है । पुलिस की औपनिवेशिक मानसिकता ब्रिटिश भारत में जो थी उसके प्रति पुलिस के लिये जो अविश्वास था वह आज भी जारी है। भारत में पुलिस जो सत्तारूढ़ दल के नियंत्रण में है विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार में लिप्त है और अपराध में खुद ही एक प्रमुख भागीदार है। इसी कें परिणाम के रूप में जो घटनायें हाल ही में घटित हुई दिल को विचलित करने वाली है।

मॉब लिंचिग (उन्मादी हिंसा) की बढ़ती घटनाओं में पुलिस ही निशाने पर क्यों है? मित्र पुलिस को जनता अपना शत्रु क्यों समझने लगी है, चाहे बुलंदशहर के पुलिस निरीक्षक सुबोध कुमार सिंह की हत्या हो, चाहे गाजीपुर में हेड कॉन्सटेबल की हत्या या चाहे प्रतातगढ़ में जेल वार्डर की हत्या हो, इस तरह के अनगिनत मामले हैं जिसमें पुलिस पर हमले हुए इसमें देखा जाये तो उत्तर प्रदेश अव्वल है।

आखिर क्यों ऐसा हो रहा है ? भीड़ की हिंसा के बढ़ते मामले दुनिया में देश की बदनामी कराने वाले ही नहीं अपितु आदिम युग की झलक पेश करने वाले हैं। कानून का लचर और निष्प्रभावी शासन देश को उस आदिम सम्यता में ले जाने वाला है जिससे निकलने में हजारों साल लगे। दरअसल जब कानून प्रत्यक्ष रूप से कार्य नही करता और न्यायपलिका भी फैसले करने में जरूरत से ज्यादा समय लगा देती है तो न्याय मूकदर्शक बनने लग जाता है। पिछले दिनो सर्वोच्च न्यायालय ने भीड़ की हिंसा के खिलाफ सख्त रूख तो दिखाया लेकिन भीड़ की हिंसा के बढ़ते मामले बता रहे हैं कि उसके सख्त रूख का जमीन पर कोई असर नहीं दिख रहा।

आखिर उग्र भीड़ को कही से तो यह भरोसा रहा होगा कि उसकी गुण्डा गर्दी का कुछ लोग सीधे या फिर दबे छिपे समर्थन करेंगे। अगर किसी नेता का संरक्षण-समर्थन का दावा करके सिस्टम को ठेंगा दिखाया जा सकता है तो यह जंगल राज की निशानी है। इस तन्त्र में पुलिस के साथ कानूनी प्रक्रिया भी शामिल है। यह तो मानना ही पड़ेगा कि सत्ता की धमक के आगे कानून दास बन जाता है और बड़े-बड़े अधिकारी भी झुक जाते हैं। अगर अलवर में दरोगा ने घायल अकबर को चन्द किलो मीटर दूरी पर स्थित अस्पताल पहुंचाने में करीब तीन घंटे लगा दिये तो इसे महज फैसला लेने में चूक नहीं कहा जा सकता ।

संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि, हम भारत के लोग संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं । इस प्रस्तावना में न तो भीड़ के न्याय के लिये कोई जगह है और न ही उसका परोच्छ या प्रत्यक्ष समर्थन करने वाले नेताओं के लिये । इस प्रस्तावना में गाय के नाम पर मनमानी करने और कानून हाथ में लेने वाले के लिये भी कोई जगह नहीं है। दर असल जब कानून बनाने वाले और उसका अनुपालन करने और कराने वाले एक भाव-भूमि में हों तो संविधान पुर्नपारिभाषित होने लगता है। ऐसी हालत में यदि अदालते भी अपना कार्य सही ढ़ंग से न करे तो स्थितियां और खराब हो जाती हैं । दुर्भाग्य से वर्तमान में ऐसी ही स्थिति नजर आती है जिसके केन्द्र में है हमारी मित्र पुलिस ।

12 अप्रैल 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने फिर से राज्यों और केन्द्र सरकार से अपने 2006 के फैसले में पुलिस सुधार के संदर्भ में दिये गये निर्देशों के अनुपालन की स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा । जस्टिस जी.एस. सिन्धवी और कूरियन जोसेफ के पीठ ने कहा ‘‘पुलिस कार्य’’ करने और दृष्टिटकोण में सुधार करने के बजाये हमने जो देखा वह इन 07 वर्षों में बद से बदतर है। प्रत्येक विधायक, सर्किल इन्स्पेक्टर और सब इंस्पेक्टरों को अपने पसंद के पद पर पोस्ट करने की मांग करता है। जाति निष्ठा, रिश्वत की राशि, विधायक के समुदाय के प्रति दृष्टिकोण और लचीलापन वे पात्र हैं जो एक पुलिस कर्मी की तैयारी निर्धरित करते हैं। राज्य स्तर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को सत्तारूढ़ दल की जरूरतों की पूर्ति के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ मामलों पर धीमी जांच । इसका ज्वलंत उदाहरण है उन्नाव के भारतीय जनता पार्टी के विधायक कुलदीप सेंगर दुष्कर्म मामला। इसमें किस तरह स्थानीय पुलिस ने 09 महीने तक मामले को दबाये रखा और तथा कथित विधायक के निर्देशों का पालन करते हुए पीड़िता एवं उसके परिवार को प्रताड़ित किया जाता रहा । जब पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत होती है। पीड़िता मुख्य मंत्री आवास के सामने आत्मदाह का प्रयास करती है तब स्थानीय पुलिस एफ.आई.आर. दर्ज कर कार्यवाही शुरू करती है। उसके बाद भी जांच को प्रभावित किया जाता रहा । इसके अलावा कुछ मामलों में राजनीतिज्ञ पुलिस को बीच में लाकर अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने का काम पुलिस मुठभेंड़ की शक्ल में करते हैं । कभी कभी फर्जी मामले भी दर्ज किये जाते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय नें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन को 1994 में केरल पुलिस द्वारा जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया जिसको 24 वर्ष की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद हाल में जासूसी के आरोप से बरी किया गया । और केरल सरकार से मानसिक क्रूरता और प्रताड़ना के लिये रू0 50.00 लाख पीड़िता को आठ सप्ताह में देने का आदेश दिया साथ ही पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता की जांच के लिये न्यायाधीश डी.के. जैन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की ।

इसी तरह छत्तीसगढ़ पुलिस राजनीतिक आकाओं की शह पर फर्जी मामले बनाकर अपने विरोधियों को जेल में डालती रही है। इस सरकार को वो लोग अखरते हैं जो पिछले काफी समय से आदिवासियों के पक्ष में आवाज उठाते हैं और आदिवासियों के शोषण का विरोध करते है। इस तरह की आवाजों को पुलिस की नजर से दबाने की कोशिश की जाती है और हर व्यक्ति को माओवादी कहकर प्रताड़ित किया जाता है। यह एक छोटी सी नजीर है। पुलिस के कारनामों की ऐसी स्थितियां और भी प्रदेशों में है।

अब सवाल उठता है पुलिस की दक्षता का ? यह तो नहीं कहा जा सकता कि हमारे देश की पुलिस कार्यकुशल है,  मामला इसके विपरीत है भारतीय परिस्थितियों में एक दम अपराधों की जांच के सिलसिलें में भारतीय पुलिस सफल होगी व्यावहारिक नहीं है। क्योकि हमारे देश में पुलिस और जांच कर्ता के सामने और भी कठिनाईयां है सबसे बड़ी कठिनाई राजनीतिक दखलंदाजी जिसके उदाहरण अक्सर आया करते हैं इसी वजह से आम जन में पुलिस के प्रति अविश्वास है। पुलिस को कोई अपनी संतान नहीं मानता । उसका संबंध एक ऐसे विभाग से है जिसके बिना सरकार का काम नहीं चल सकता । उसे किसी भी सम्य सरकार के अत्यंत मूलभूत और महत्वपूर्ण कार्य करने पड़ते हैं लेकिन इन सबके बावजूद उसके महत्व को कोई खास तरजीह नहीं दी गई। ऐसा नहीं है कि भारतीय राजनीति के कर्णधारों को इसका इल्म नही है। समय-समय पर पुलिस आयोग और कमेटियां गठित होती रहती है लेकिन बार बार उनके सुझावों को रद्दी के टोकरी में फेंका जाता रहा है। और बाध्य किया जाता रहा है पुलिस तंत्र राजनीतिज्ञों की कठपुतली बनकर रहे जो एक गलत नजीर पेश करता है।

पुलिस के नैतिक साहस, हिम्मत और आत्म विश्वास बनाये रखने के लिय उनकी सेवा में परिवर्तन तो किया जाना चाहिये और जो उनकी मूलभूत समस्याये हैं जैस-आवास और खाने पीने की,  इसका त्वरित निराकरण जरूरी है इसके लिये पुलिस के उच्च अधिकारियों को इनके दर्द को सामने रखते हुए उसका हल निकाला जाना चाहिये । ना कि खुद को मलाईदार पद के लिये राजनीतिज्ञों के हाथों की कठपुतली बन जाना।

अपराधों को रोकने अपराधो की जांच करने अपराधियों को दण्ड देने जांचकर्ताओं को सामाजिक मान्यता दिलवाने प्रशासन की विश्वसनीयता बढ़ाने में उच्च अधिकारियों को सहयोग करना चाहिये कयोंकि यह असाधारण कल्पना और सूझबूझ की मांग करता है।

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