एससी/एसटी पर कोर्ट के निर्णय से ओबीसी में फिर उठी कोटे में कोटा की मांग, एक ही जाति के लोगों को मिल रहा आरक्षण

वैसे तो आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग पहले भी उठती रही, लेकिन अब एससी/एसटी पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद जिस तरह का रुख भाजपा और उसके सहयोगी दलों का है उससे माना जा रहा है कि इस दिशा में जल्द ही राज्य सरकार निर्णय कर सकती है।  35 प्रतिशत लोगों को नहीं मिला लाभ योगी सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के साथ ही भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र कश्यप कहते हैं कि वर्षों से सामाजिक संगठन ओबीसी में अति पिछड़ों को उनके आरक्षण का अधिकार देने की मांग उठा रहे थे।

अब भी ओबीसी में करीब 35 प्रतिशत लोगों को आरक्षण का अधिकार नहीं मिल सका है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी के साथ ओबीसी वर्ग में भी कोटे में कोटा देने का प्रावधान करने का निर्णय किया है।

इससे वंचित वर्ग को बड़ी राहत मिलेगी।

हमारी यूपी की सरकार, केंद्र सरकार के साथ मिलकर इस पर शीघ्र नीति बनाएगी। गौरतलब है कि पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (पीडीए) का नारा देकर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव हाल के लोकसभा चुनाव में पिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने में सफल रहे जिससे पार्टी के 37 सांसद जीते।

चुनाव में सत्ताधारी भाजपा को बड़ा झटका लगा।  चूंकि, वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अखिलेश का पिछड़े वर्ग पर कहीं ज्यादा फोकस बना हुआ है, ऐसे में माना जा रहा है कि पिछड़े वर्ग को साधने के लिए भाजपा सामाजिक न्याय समिति की संस्तुतियों पर जल्द निर्णय कर बड़ा राजनीतिक दांव चल सकती है। पहले भी हुई है ओबीसी को साधने की कोशिश ओबीसी के आरक्षण को लेकर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वर्ष 2016 में अपनी सरकार के रहते दांव चला था।

अखिलेश ने मुख्यमंत्री रहते हुए ओबीसी की 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था।  इसमें ओबीसी वर्ग की कहार, कश्यप, केवट, निषाद, बिंद, भर, प्रजापति, राजभर, बाथम, गौर, तुरा, मांझी, मल्लाह, कुम्हार, धीमर, गोडिया और मछुआ शामिल थी।

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