पुलिस वर्सेस वकील- वर्चस्व की लड़ाई

संक्षेप:

  • पुलिस और वकील के बीच हुई मारपीट दुर्भाग्यपूर्ण
  • तत्कालीन डीसीपी नार्थ किरण बेदी ने वकीलों पर कराया था लाठीचार्ज
  • क्या इस घटना को टाला जा सकता था?

By: मदन मोहन शुक्ला

तीस हजारी कोर्ट में 2 नवंबर को जो मारपीट पुलिस और वकील के बीच हुई वो भी पार्किंग को लेकर वो दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां घटना जो हुई ,वास्तविकता तो जांच के बाद स्पष्ट होगी। रिटायर्ड जज एफ सी गर्ग के नेतृत्व में न्यायिक जांच का आदेश हुआ है। लेकिन यहां कहीं न कहीं दोनों पक्षों ने धैर्य रखने से परहेज़ किया है और यह लड़ाई वर्चस्व को लेकर हो गयी। पुलिस और वकीलों के बीच झड़प या जंग का इतिहास बहुत पुराना है। इससे पहले 1988 में दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच भिड़ंत हुई थी उस समय पुलिस का पलड़ा भारी रहा था। तत्कालीन डी सी पी नार्थ किरण बेदी ने वकीलों पर लाठीचार्ज कराया था। घटना कुछ यूं  थी कि 15 जनवरी 1988 को पुलिस ने एक वकील को सेंट स्टीफन कॉलेज से एक लड़की का पर्स चुराते पकड़ा था। जब 16 जनवरी को हथकड़ी लगाकर तीस हजारी कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया तो वकील वहां भड़क गए हथकड़ी लगाने पर, उन्होंने तत्काल आरोपी वकील को छोड़ने की मांग और पुलिस कर्मियों के खिलाफ़ कार्रवाई की मांग की। मजिस्ट्रेट ने वकील को छोड़ दिया और दिल्ली पुलिस आयुक्त वेद मारवाह को आरोपी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया लेकिन पुलिस ने न कोई जांच कराई न ही कोई कार्रवाई हुई। परिणामस्वरूप वकील हड़ताल पर चले गए फिर  18 जनवरी को पुलिस हेडक्वार्टर में वकीलों पर लाठीचार्ज होता है। 20 जनवरी को किरण बेदी ने एक बयान जारी कर पुलिस लाठीचार्ज को सही ठहराया। इसमें पुलिस आयुक्त वेद मारवाह भी पुलिस के साथ खड़े दिखें।

पुलिस के इस रवैये से नाख़ुश वकीलों ने दिल्ली और हरियाणा की कोर्ट में हड़ताल कर दी जो 2 महीने चली। दिल्ली हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए डी पी वाधवा के नेतृत्व में दो सदस्यी समिति गठित की, तब हड़ताल समाप्त हुई। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वकील को हथकड़ी लगाना गैरकानूनी था। समिति ने किरण बेदी के ट्रांसफर की सिफारिश की थी।

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सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और अनुशासन की श्रेणी में न आने वाला था दिल्ली पुलिस कर्मियों द्वारा पुलिस मुख्यालय पर धरना व प्रदर्शन और दिल्ली-चंडीगढ़ हाईवे को बाधित करना। पुलिस आयुक्त अमूल्य पाटिल के बार-बार अनुरोध ,"पुलिसकर्मियों को आश्वस्त किया कि उनकी चिंताओं पर ध्यान दिया जाएगा। बीतें कुछ दिन हमारी परीक्षा की घड़ी रही हैं। न्यायिक जांच चल रही है आप प्रक्रिया पर भरोसा बनाये रखें।" लेकिन अफसोस पुलिसकर्मी अपने आयुक्त की बातों से संतुष्ट नही दिखें और धरना जारी रखा। यह अनुशासन का घोर उल्लंघन है।
तीस हजारी मामलें में दिल्ली हाइकोर्ट के निर्देश पर रविवार 10 नवंबर को पुलिस और वकीलों के बीच समन्वय बैठक उपराज्यपाल के अध्य्क्षयता में होती है जो बे-नतीज़ा रही। दरअसल पुलिस और वकील दोनो ही आरोपितों पर कार्रवाई के लिए अड़े हुए थे। जबकि पुलिस अधिकारी कह रहे थे न्यायिक जांच के बाद ही आरोपितों पर कार्रवाई होगी।

किरण बेदी 2 नवंबर की हुई घटना में पुलिस जवानों के समर्थन में आ गयी दिल्ली पुलिस को सलाह दी अपने रुख पर दृढ़ता से कायम रहे चाहे नतीज़ा कुछ भी रहे। किरण बेदी का यह रुख भड़काऊ लगता है जबकि 1988 के घटनाक्रम के संदर्भ में कोर्ट ने लाठीचार्ज और वकील को हथकड़ी  लगाके कोर्ट में लाने पर सीधे तौर पर किरण बेदी को दोषी  माना था और इनके ट्रांसफर की सिफारिश की थी।

अब सवाल उठता है कि क्या इस घटना को टाला जा सकता था। वीडियो फुटेज में पार्किंग स्थान पर गाड़ी खड़ी करने को लेकर कहासुनी तो हुईं लेकिन मारपीट नहीं हुई तो फिर पुलिस ने क्यों आरोपी वकील को लॉक अप में बंद किया फिर दबाब में आकर छोड़ा? लॉक अप में गोली कैसे चली, लॉक अप की ग्रिल से टकराकर गोली वकील को लगी जिसने आग में घी का काम किया। उसके बाद जो हुआ उसके लिये आरोपित वकीलों की जितनी निंदा की जाए वह कम है। यहाँ पुलिस जो कोर्ट परिसर के माहौल से वाकिफ है ,वकीलों और मुवक्किल से मित्रवत व्यवहार की पुलिस से अपेक्षा, इसमें कहीं चूक हुई। लेकिन वकीलों ने जिस हिंसा का परिचय दिया जिसमें महिला आई पी एस डी सी पी की जान पर बन आई यह वकालत के प्रोफेशन पर बदनुमा दाग है। इसको हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान में लेकर दागी वकीलों पर कठोर से कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। इधर कुछ सालों में वकील इस कदर बेलगाम हो गए हैं अभी हाल ही में कानपुर में एस एस पी कार्यालय में तोड़फोड़, बाराबंकी में जज से बदसलूकी, 50 वकीलों पर केस। जज बोले- काम करते समय हमला, गनर की कार्बाइन छीनने की कोशिश।दिल्ली कांड को लेकर कार्य वहिष्कार कर रहे थे। इसी तरह की घटनाएं लखनऊ से लेकर फैज़ाबाद होते हुए आज़मगढ़ ,सहारनपुर तक  हुई जिसमें वकीलों की गुंडागर्दी सामने आई, जिसमें पुलिस,प्रशासन और न्यापालिका लाचार दिखी। यही कुछ हालात दिल्ली घटना में भी देखने को मिली है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया(बी सी आई)के अध्यक्ष मनन मिश्रा ने आरोपित होने वाले वकीलों पर सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है, जिनकी वजह से संस्था की छवि धूमिल हुई है। दिल्ली हाईकोर्ट के शानदार कदम के बाद भी 4 नवंबर को वकीलों ने जो आचरण किया उसने हमें विचलित किया। हिंसा का सहारा लेकर हम अदालतों, जांच कर रहे न्यायधीश, सी बी आई ,आई बी और सतर्कता विभाग की सहानभूति भी खो रहें हैं। यहां तक कि आम जनता की राय हमारे खिलाफ जा रही है। इसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं।

इसी साल 24 अप्रैल 19 को  हावड़ा कोर्ट में हावड़ा निकाय कर्मियों और वकीलों में पार्किंग को लेकर मारपीट फिर पुलिस लाठीचार्ज, कई वकील घायल होते हैं। लेकिन पुलिस न कोई जांच कराती है और न किसी दोषी को सज़ा होती है। यह कृत्य पुलिस को भी कटघरे में खड़ा करता है। ऐसे भी पुलिस की छवि भारत के परिपेक्ष्य में मित्र की न होकर आए दिन बर्बरता की नई-नई मिसाल पैदा करने वाली है। आज भी पुलिसिंग के लिए हमारे अधिकारी गण लंदन,न्यूयॉर्क, स्वीडन न जाने कितने देशों की खाक छान कर आते हैं, करोड़ों खर्च होते हैं, रिपोर्ट दाख़िल करते है लेकिन पुलिस वही जो आज से 70 साल पहले थी। आखिर पुलिस क्यों नहीं सुधर रही। इधर पुलिस और आमजन में मारपीट और भिड़ंत की घटना में बढ़ोत्तरी हुई है। क्या कारण है जब कोई पुलिस वाला भीड़ की उग्रता का शिकार होता है तो उसे जनता की सहानभूति नहीं मिलती? क्यों पुलिस के नाम पर मासूम जिसको अपराध की ए, बी,सी ,डी भी नहीं मालूम रोने लगता है। पुलिस लंदन और स्कॉटलैंड पुलिस की तरह मित्र पुलिस क्यों नहीं बन पा रही है? क्यों पुलिस का खौफ़ आम आदमी के ज़ेहन में रहता है। थाने की चौखट पर पीड़िता अपनी गुहार ले जाने में डरता है, क्योंकि उसको इस बात का डर रहता है पुलिस कहीं उसे ही न अपराधी मान ले।

अगर हम उत्तरप्रदेश पुलिस की ही केवल बात करे तो चंद उदाहरण जो पुलिस छवि को तार-तार करते हैं। कुलदीप सिंह सेंगर भाजपा विधायक उन्नाव जो बलात्कार और हत्या में आरोपित है। इसको बचाने में भाजपा सरकार ने किस तरह पीड़िता के परिवार को प्रताड़ित करने में पुलिस मशीनरी का दुरुपयोग किया। उस क्षेत्र के सारे थानों के पुलिसकर्मी किस तरह बलात्कारी विधायक के इशारों पर पीड़िता और उसके परिवार पर जुर्म किया। यह दुष्कर्मी पूरे दो साल तक पीड़िता को प्रताड़ित करते रहे। पुलिस इनके परिवार के लोगों को झूठे मुकदमे में पकड़ कर जेल में डालती रही और विधायक और उसके गुंडे मनमानी करते रहे। स्वामी चिन्मयानंद केंद्र में अटल सरकार में राज्य मंत्री गृह रहा जो अब बलात्कारी है इसको बचाने में भी भाजपा सरकार ने पुलिस तंत्र का दुरुपयोग किया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर विशेष जांच दल का गठन किया गया लेकिन इसकी भी गतिविधियां पीड़िता को प्रताड़ित करने और बलात्कारी चिन्मयानंद को बचाने की रही है।

जवाहर हत्याकांड में तो कोर्ट ने बाकायदा विवेचक पी के वर्मा के खिलाफ एस एस पी प्रयागराज को कार्रवाई करने का आदेश दिया। अपर जिला जज बद्री विशाल पांडेय ने अपने फैसले में कहा कि विवेचक ने अभियुक्तों को लाभ पहुंचाने की मंशा से त्रुटिपूर्ण विवेचना की। कोर्ट में बचाव पक्ष की खुलेआम मदद की। विवेचना जिसमें तीन की हत्या और 2 घायल होते हैं। ऐ के 47 से हमला होता है लेकिन पुलिस संवेदनहीन रहती है। उसे ज़रा सा भी अपनी ज़िम्मेदारी व कर्तव्य का एहसास नहीं होता है। यह कुछ चंद उदाहरण है। ऐसे तो पुलिस के कई कारनामे हैं जिस पर एक मोटी किताब लिखी जा सकती है। अब सवाल उठता है पुलिस क्यों राजनीतिज्ञों और सरकारों की कठपुतली बन कर रहती है। जब आम आदमी द्वारा अपराध होता है तो पुलिस जीरो टॉलरेंस पर काम करती है। लेकिन जब यह अपराध सत्ता दल के माननीयों द्वारा होता हैं तो पुलिस सक्रिय हो जाती कैसे इन माननीयों को बचाया जाए और पीड़िता को झूठे मुकदमें में फंसा कर प्रताड़ित किया जाय। कमोबेश यह हाल पूरे देश की पुलिस का है।

मैं यह नहीं कहता कि पूरा पुलिस तंत्र ही अपराधियों को बचाता है या सरकारों या राजनीतिज्ञ के शरण में रहता है। कुछ पुलिसकर्मी या अधिकारी बहुत ही काबिल हैं, कभी राजनीतिक दबाब में नहीं आते । जनता को न्याय दिलाने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं ।लेकिन अफसोस ऐसे अधिकारी अपने ही विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा राजनीतिक आकाओं के इशारे पर प्रताड़ित किये जाते हैं।

पुलिस जब तक किसी भी तरह के दबाब से बाहर आकर जनता से मित्रवत व्यवहार को स्थापित नहीं करेगी। जनता का विश्वास नहीं जीतेगी और यह भाव नहीं पैदा करेगी, पुलिस हमेशा आपको सुरक्षित रखने के लिए कटिबद्ध है। तब तक पुलिस-वकील या पुलिस-जनता में संघर्ष होता रहेगा। पुलिस भीड़ तंत्र का शिकार होती रहेगी। इसमें पुलिस के उच्च अधिकारियों को भी राजनीतिज्ञों से गठजोड़ को विराम देना होगा और पुलिस के हितों की रक्षा में तत्पर रहना होगा।

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