देश तो आजाद हुआ लेकिन हम गुलाम हो गयेे

संक्षेप:

  • `देश तो आजाद हुआ लेकिन हम गुलाम होते गए`
  • आज़ादी के नाम पर रो रही दूसरों की आज़ादी में दखलंदाजी
  • क्या हमारे महापुरुषों ने यही सपना देखा था ?

By: मदन मोहन शुक्ला

लखनऊ: आज़ादी के 72 वर्ष हमने पूरे कर लिए इसकी खुशी है या दिल के किसी कोने में छुपा दर्द, देश तो आजाद हुआ लेकिन हम
ग़ुलाम होते गए। मानसिकता के स्तर पर आचार-विचार और व्यवहार के स्तर पर। आज़ादी को हमने उच्छृंखल स्वभाव की-सजयाल मान लिया।

अपनी आज़ादी के नाम पर दूसरों की आज़ादी में दखलंदाजी करने लगे। सद्भाव भाईचारा प्रेम और बंधुत्व सब बेमानी हो गए । सड़कों पर उत्पात मचाना, सार्वजानिक सम्पति को नुकसान पहुंचाना। प्राकृतिक संसाधनों को तहस नहस कर और गंदगी फैलाकर हम राष्ट्र निर्माण से विमुख होते गए । हम लोग जिस मानसिकता के ग़ुलाम होते जा रहे हैं, क्या हमारे महापुरुषों ने यही सपना देखा था ?

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अगर इतिहास के पन्नो को पलटे तो 1950 में लागू होने वाले सविंधान द्वारा निर्देशित भारतीय राज्य धर्मनिरपेक्ष होने की इच्छा रखता है लेकिन व्यहार में धर्म ने भारतीय राज्य के तंत्र में गहराही से प्रवेश किया है जो लगातार सविंधान के धर्मनिरपेक्ष आदर्शो के खिलाफ आतंकवाद को हवा देता है। धर्मनिरपेक्षता तर्कसंगत और उदार विचारो का एक आन्दोलन है जो व्यक्ति के जीवन में धर्म की भूमिका को कम करने की कोशिश करता है। इस पर जो भी दल सत्ता में रहे चोट करते रहे।

लोकतंत्र की दूसरी त्रासदी रही आज़ादी के बाद जातिवाद समाप्त होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1970 के दशक में गैर कांग्रेस दलों ने जाति और धर्म के नाम पर मोर्चा खोला तो कांग्रेस ने दलित कार्ड को हवा दी। इस तरह समाज को धर्म और जाति के आधार पर बाटने का खेल कांग्रेस और बीजेपी ने बखूबी किया जिसका विभस्त रूप आज देखने को मिल रहा है। कांग्रेस जब जब भी सत्ता में रही अपने राजनैतिक लाभ के लिय जमकर दोहन किया इसकी शुरुवात आपातकाल के ठीक बाद इंदिरा गांधी ने की। ठीक इसी समय 1980  के चुनाव के दरमियाँ राजनीति का अपराधिकरण की जनक भी इंदिरा गांधी रही। अपने विरोधियों को काउंटर करने के लिए अपराधियों को संरक्षण दिया वही बाद में नेता बन बैठे। आज उसका नतीजा हमारे सामने है बाहुबली आज पुलिस संरक्षण में घूम रहें है। वर्तमान मोदी
सरकार उसी लीक पर चल रही है जिस पर चल कर कांग्रेस सत्ता पर काबीज रही और वही उसके पतन का कारण बना।

मोदी सरकार से जो उम्मीद थी वह मरीचिका साबित हुई। बीते साढ़े चार सालो में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में एक विशेष जाति के खिलाफ जो मुिहम चल रही है तथा उनको टारगेट किया जा रहा है कभी गोरक्षा के नाम पर तो कभी लव जिहाद के नाम पर । यह कौन सी संस्कृति विकसित कर रहे हैं क्या सन्देश हम आगे वाली पीढ़ी को दे रहे हैं? क्या यही लोकतंत्र है कि एक भीड़ को बेकाबू होने दे रहे हैं इसमें सहमती उच्च पदों पर आसीन सत्त्ताधारियों की है। हमें शर्म आती है अपने लोकतंत्र पर जब हमारे मंत्रीगण सजायाफ्ता अभियुक्तों को जिन्होंने खुलेआम एक विशेष जाति को पीट-पीटकर मार दिया उसको बेशर्मी से माला पहनाते हैं और फिर बेशर्मी से इस कृत के लिए माफ़ी मांग लेते हैं।

एक और केंद्रीय मंत्री अभियुक्त के जनाजे में उसके शव को तिरंगे में लपेटने को जायज़ मानते हैं। हमारे प्रधान सेवक इस पर मौन रहते हैं। पिछले दो सालों में इस भीड़ ने अलग-अलग कारणों से सौ से ऊपर लोगों को पीट-पीट कर मार दिया और उनके पार्टी के नेता बेतुका धार्मिक उन्माद को भड़काने वाले भाषण देते रहे लेकिन प्रधान सेवक ने उफ़ तक नहीं की बस सतही सन्देश दिया “हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी” उसके बाद अलवर में रकबर के साथ जो हुआ तथा वहां की पुलिस और सरकार का जो रवैया रहा वो इनकी मानसिकता को दर्श्ता है।

प्रधान सेवक ने अपने 15 अगस्त को दिए गए भाषण में कहा था, मैं बैचेन हूँ बेसब्र हूँ और व्याकुल हूँ। किस लिए? क्यों कठुआ पर -शांत रहे जब आठ साल की मासूम के साथ बलात्कार हुआ और आप के ही दो मंत्री बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में भीड़ की अगुआई कर रहे थे उस समय बैचन नहीं हुए। आपकी पार्टी का उ०प्र० के बलिया से विधायक सुरेन्द्र सिंह उन्नाव गैंग रेप के मामले में कहता है तीन बच्चों की माँ के साथ कौन रेप करेगा तब आप ने क्या कार्यवाही की, क्यों नहीं बैचन हुए। आप तो नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं फिर क्यों नहीं बलात्कार में आरोपित उन्नाव के विधायक के खिलाफ कोई कार्यवाही की। क्यों नहीं अपने बेलगाम हो रहे मंत्रियो जो धार्मिक उन्माद फैला रहे हैं उन पर आप खामोश हैं। आप न बैचेन हैं न बेसब्र न व्याकुल यह कौन सा राज धर्म है या किसका दबाब ?

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर काम कर रहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लेकर जब-ंउचयतब सवाल उठते रहे हैं। उसकी कथनी और करनी में अंतर के कारण ही ऐसा होता रहा है । वैसे तो यह संघटन अपने जन्म के समय से ही विवादों में रहा लेकिन हाल के वर्षों में उसकी ओर से जिस प्रकार की गतिविधियाॅं की जाती रही हैं उससे तो और भी शंकाएं पैदा होने लगी हैं। इसीलिए समय- समय पर इसकी
पड़ताल भी की जाती रही है । फिलहाल इसकी जाँच की जरूरत नये सिरे से महसूस की जाने लगी है। संघ और उनसे जुड़े संघटन और
उनके कार्यकर्ता जिस तरह से मोरल पुलिसिंग के बहाने लोगो पर हमले करने लगे हैं उससे साफ़ होता है कि उसकी मंशा क्या है और यह कैसा राष्ट्र बनाना चाहते हैं?

हिन्दू राष्ट्रवाद 1930 में यूरोपियन फासिज्म से उधार लिया गया था । इसका मूल आधार हिन्दुओं के अलावा अन्य को दुश्मन घोषित करना होता है। कट्टर हिंदुत्व ने हिटलर और मुसोलिनी से प्रेरणा ग्रहण की और उन्ही के अनुरूप फ़ासिस्ट समाज बनाने की कोशिश करता रहा है उसकी यह कोशिश न केवल लगातार जारी रही बल्कि वह एक तरह से परवान चढ़ने लगी है . इसीलिए यह लोकतंत्र और समाजवाद में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए जाहिरातौर पर कहीं ज्यादा चिंता और भय की स्थिति बनती जा रही है। मुख्य रूप से इसे तब से
भली भांति चिन्हित किया जा सकता है जब महात्मा गाँधी की हत्या की गई । साल 1940 के आसपास बहुसंख्यक वादी कट्टर हिंदूवादी संघटनों का असली रूप सामने आ गया था जब वे फासिज्म और नाज़ीवाद की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करने लगे । हिटलर और मुसोलिनी द्वारा किये गए अत्याचारों और हिंसक कार्यवाइयों का समर्थन किया जाने लगा ।

इस आधार पर आसानी से समझा जा सकता है कि क्या यह अंग्रेज विरोधी नीतियां या विचार थे ? इस सबसे तो यही पता चलता है कि हिन्दू राष्ट्रवादियों ने अंग्रेेजो के खिलाफ लड़ाई के बजाय खुद को मुस्लिमों और कांग्रेस की खिलाफत पर ज्यादा केंद्रित किया । यह बात इससे और स्पष्ट हो जायगी “टीपू अंग्रेजी राज के विरुद्ध लड़ने के लिए भारतीयों का हौसला था। वह ऐसा महानायक था जिसे अंग्रेज फूटी आँख नहीं देखना चाहते थे।”

टीपू की इस छवि को क्षतिग्रस्त करने के लिए इतिहास को विकृत करना जरूरी था चूंकि टीपू धर्म से एक मुस्लिम शासक, साम्राज्यवादी इतिहासकारों की यह व्याख्या साम्प्रदायिक इतिहास लेखन परम्परा में जिन्दा रही क्योंकि आर० एस ० एस० सरीखे संघटनों ने इसे आगे
बढ़ाया इसीलिय टीपू को साम्प्रदायिक साहित्य में ठीक उसी तरह चित्रित किया गया जैसा अंग्रेजो ने चाहा था। इतिहास को वर्तमान मोदी सरकार राजनीतिक हित को ध्यान में रखते हुय तोड़ मरोड़ कर पेश करती रही है कभी बाबर मुद्दा तो कभी टीपू को हिन्दू विरोधी तथा मंदिर विध्वंसक के रूप पेश कर के धार्मिक उन्माद को हवा दी जाती रही है केवल वोट बैंक का ध्रुवीकरण कर सत्त्ता हासिल करने के लिये। जबकि वास्तविकता यह है की टीपू कतई हिन्दू विरोधी नहीं था न मंदिर को क्षतिग्रस्त करने वाला। टीपू ने तो कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया।

यही नहीं श्रीरंगेरी मठ पर मराठा हमले के वक़्त टीपू हिन्दू धर्म के रक्षक के तौर पर सामने आया। टीपू ने मराठा हमले से धराशाई हो
गए, मठ की मरम्मत कराई जिसमे माँ शारदा देवी की मूर्ति भी शामिल थी। सबसे आश्चर्य की बात है कि टीपू की सेना में कमांडर इन
चीफ एवं टीपू का सचिव हिन्दू था । वहीं इसके विपरीत छत्रपति शिवाजी की सेना में 12 सेनापति मुसलमान थे वे कभी मुस्लिम
विरोधी नहीं थे उन्होने इस्लाम धर्म के पवित्र स्थान को पूरा सम्मान दिया। पहले युद्ध सत्त्ता के लिए होते थे न की धर्म के लिए ये तो हमारे राजनीतिज्ञ है जो हर चीज धर्म से जोड़ देते हैं। धर्म का इतना विकृत रूप तो कभी नहीं देखा ।

राजस्थान के राजसमंद की एक घटना जिसमें शम्भूलाल नामक व्यक्ति ने अफराजुल नाम के मुस्लिम मजदूर की हत्या कर उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दिया था। इस तरह की घटनायें अब तक केवल आतंकी संघटन करते आए हैं। हत्या के बाद धार्मिक उल्लास नारेबाजी और अभियुक्त के समर्थन में हिंदूवादी संघटनों द्वारा प्रदर्श तथा जबरदस्ती पुलिस गिरफ़्तारी से छुड़ाने की कोशिश इसके लिए
सड़क पर उतर कर तोड़ फोड़ करना. यह किसी भी धर्म का धार्मिक कृत्य नहीं हो सकता। आम आदमी के लिए सवाल यह है कि वह धर्म के
नाम पर बढ़ती कट्टरता को किस तरह देखें ? जब कोई धर्मांद किसी व्यक्ति की हत्या करता है तो क्या आम आदमी को धार्मिक संतुष्टि मिलती है ?

आज किसी भी धर्म के अंदर कट्टरता और उदारता के विचार को पहचानने की जरूरत है। ऐसा करके ही हम धर्म की सत्त्ता का राजनीतिक
इस्तेमाल करने वालों की पहचान कर सकते हैं और खुद को उन्मादों की भीड़ से अलग कर सकते हैं। हिन्दू समाज के लिए यह संकेत है कि उसके अंदर भी कट्टरपंथियों का समूह उभर रहा है उसे ऐसे कट्टरपंथी समूहों को चिन्हित करना होगा जो अपनी अस्मिता के खतरे बताकर दूसरे समूहों को शत्रु के रूप में प्रचारित कर रहें हैं । आज धर्म की सहज भावना के साथ खड़ा होना होगा।

                                                                                                                                                                         ( यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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