मोदी की छवि से इतर सवाल भ्रष्ट कौन नेता या नौकरशाह

संक्षेप:

  • क्या देश ब्लैकहोल में जा रहा है?
  • अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक विरासत छोड़ना चाहते हैं मोदी
  • कांग्रेस की तरह ही गलती कर रही है भाजपा

By: मदन मोहन शुक्ला

क्या देश ब्लैकहोल में जा रहा है,जो आर्थिक स्थिति देश की है वो तो उसी तरफ इशारा कर रही है।लेकिन मोदी जी का परचम पूरे विश्व में फहरा रहा है।हुएस्टोन टेक्सास में हाउडी मोदी में जो अमेरिकन इंडियन का जनसैलाब उमड़ा वो उनके इवेंट मैनेजमेंट की एक मिसाल है जिसमे उनको महारत हासिल है जिसमें डोनाल्ड ट्रम्प की शिरकत, उनका मोदी को फादर ऑफ नेशन और मोदी का पलट कर कहना "अबकी बार ट्रम्प सरकार।"यह मोदी की कूटनीति का हिस्सा है या राजनीतिक चूक।क्योंकि जो विदेश नीति होती है उसमें व्यक्तिगत रिश्तों की एक सीमा होती है जिसको डोनाल्ड ट्रम्प भली भांति समझते हैं लेकिन मोदी शायद ट्रम्प की कूटनीति से अनजान है।मोदी जी ट्रम्प पे ज्यादा भरोसा करके जो आपके वाकई में दोस्त   देश हैं उनमे शंका न पैदा करिये।क्योंकि ट्रम्प को तालिबान से सामंजस्य बैठाने के लिए इमरान खान की ज़रूरत है और व्यापारिक दृष्टि से भारत।इसीलिए तो ट्रंप गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते जिसको मोदी को समझना होगा।साथ साथ अपने मित्र देशों से तारतम्य बैठाना होगा।

आपको देश के पिता की विभूति से अलंकृत किया गया लिहाजा अब विदेशी दौरों को विराम देते हुए अपने पुत्र समान जनता की दुश्वारियों पर मनन कर समस्या का समाधान ढूंढिए।डगमगाती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाइये।

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मोदी अंतराष्ट्रीय स्तर पर एक विरासत छोड़ना चाहते हैं जिसमें इतिहास  में नाम दर्ज हो।यहाँ स्वीडन की पर्यावरण संरक्षक ग्रेटा थुंबर्ग ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी जी से कहा था पर्यावरण संरक्षण के नाम पर छोटी छोटी सफलताओं पर जश्न मनाएंगे  तो बड़ी जंग हर जाएंगे इतिहास फिर खलनायक के तौर पर देखेगा यह बात राजनीतिक जीवन मे फिट बैठती है।इसीलिए विभाजनकारी ,नफ़रत की राजनीति से परे जाकर सब वर्गों में सौहार्द पैदा करना होगा।लेकिन ऐसा नही है।यह समय का कालचक्र है और इतिहास भी इसका गवाह है कि जो सत्ता में रहते हुए अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हैं उनको उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है जैसा कि कांग्रेस के कुछ नेताओं के साथ हो रहा है। यह बात सत्ताधारियों को भी अपने ज़ेहन में रखनी होगी।

भाजपा वही गलती कर रही है जो कांग्रेस ने पूर्व में किया और सत्ता से बाहर हो गयी।विरोधी पार्टीयों का जितना कूड़ा कबाड़ या जंक पदार्थ वोह बी जे पी में आकर शुद्ध हो जाता ।यह लोग भी सत्ता का कोपभाजन न बनें बिना किसी लाग लपेट के भगवाधारी बन कर वैतरणी पार कर लेते है।भाजपा अपने विरोधी दलों के जनाधार में सेंध लगाने में कोई गुरेज नही कर रही है और वो जनता के सामने यह दम्ब भर्ती है उसकी टी आर पी चरम पर है ।जहां तक आधार की बढ़ने की बात है तो वो आज के नेताओं में सत्ता सुख की चाह है।यानी जो भाजपा की छवि थी जो इसके सिद्धांत थे उससे भटक गईं है इसका सीधा कारण है कि एक बार सत्ता का चस्का लग जाए तो उस पर बने रहने की चाहत का जुनून अपने सिद्धांतों से भटका देता है।वहीं वो गलती कर बैठता है।भाजपा वही गलती कर रही है।

अमित शाह गृह मंत्री ने कहा कि पूरे देश मे एन आर सी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स )लागू होगा। यानि कल हम सबको भी हो सकता है दस्तावेज़ के अभाव में घुसपैठियों की श्रेणी में न रख दिया जाए।फ़िलहाल इसको लेकर भाजपा के अंदर भी विरोध के स्वर उभर रहें क्योंकि असम में करीब 2लाख का भविष्य अनिश्चित हो गया है वहां के वित्त मंत्री हेमंत विस्वास शर्मा ने यहाँ तक कह दिया है नागरिक संशोधन बिल इसी शीत सत्र में लाया जाएगा जिसमें पाकिस्तान,अफगानिस्तान और बंगलादेश के अल्पसंख्यको को नागरिकता दी जा सके,इन मुद्दों को भाजपा सुप्रीम कोर्ट में रखेगी।यानी सियासत पार्टी के अंदर गर्माएगी।जो पार्टी में विरोधाभास जन्म ले रहा है वो दर्शाता है पार्टी के अंदर सब कुछ अच्छा नही। भाजपा सत्तानसीन है इसको सालो साल बनाए रखना है विपक्ष पंगु हो चला है तो सरकार वो सारे जतन कर रही है। एक एक करके संवैधानिक संस्थाओं को बाध्य कर रही है कि वो सरकार के मनमुताबिक हो ।राजनीतिक सत्ता की ज़रूरतों को समझे वही रिज़र्व बैंक के बोर्ड में है। कमोबेश यही स्थिति हर संस्थान में है।

अभी हाल में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर बिहार में अब तक का सबसे कड़ा और तीखा प्रहार था।इतिहास में पहली बार पटना हाइकोर्ट के किसी जज ने एक मामलें की सुनवाई के दौरान न सिर्फ हाइकोर्ट की कार्यप्रणाली पर प्रहार किया बल्कि भ्रष्ट अधिकारियों पर न्यायालय से मिल रहें संरक्षण पर गंभीर टिप्पढ़ी की ।जस्टिस राकेश कुमार ने यहाँ तक कह दिया "देख रहा हूं कि सीनियर जज चीफ जस्टिस को मस्का लगाते हैं।"

पूर्व आई ए एस के पी रमैया की जमानत याचिका खारिज़ करने वाले जज राकेश कुमार ने जब देखा कि निचली अदालत ने उन्हें जमानत दे दी तो वो बिफर पड़े।सवाल उठाया जिसे हाइकोर्ट ने जमानत नही दी सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नही दी उसे निचली अदालत ने जमानत कैसे दे दी?जस्टिस राकेश ने न्यायधीशों के सरकारी बंगलो पर होने वाले अनावश्यक खर्चे पर सवाल उठाया।उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है न्यापालिका में सब कुछ ठीक नही है।

अभी हाल में जस्टिस रंजन गोगोई,एस एस बोबडे और एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान टिप्पढ़ी की कि जजो के ट्रांसफर पोस्टिंग न्याय की जड़ है,इसमें हस्तक्षेप संस्थान के लिए अच्छा नही।इससे लगता है सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच सब कुछ अच्छा नही।कोलोजियम एक बार फिर सरकार के राडार पर है।मामला था गुजरात अधिवक्ता संघ की एक याचिका थी।जस्टिस ए ए कुरेशी को मध्यप्रदेश का चीफ जस्टिस बनाया गया था जो केंद्र सरकार के विचाराधीन था सरकार को कुछ आपत्ति थी । मई से केंद्र सरकार फ़ाइल दबा के बैठी थी ,केंद्र की आपत्ति को वरीयता देते हुए कोलोजियम ने आदेश में संशोधन कर उन्हें त्रिपुरा का चीफ जस्टिस बना दिया जिसका गुजरात बार संघ ने पुनर्विचार याचिका दायर कर गुजरात का चीफ जस्टिस बनाने की गुजारिश की थी।इसमे इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में एसोसिएशन के अध्य्क्ष यतीन ओझा ने आरोप लगाया जस्टिस कुरेशी की नियोक्ति में जबरदस्ती केंद्र सरकार अड़ंगा लगा रही है।यह वही जज है जिन्होंने 2010 में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में अमित शाह वर्तमान में गृह मंत्री के खिलाफ़ फैसला देते हुए जेल भेजा था।
दूसरा मामला 2011 का,राज्यपाल दुआरा लोकायुक्त की नियोक्ति को सही ठहराया था उस समय केंद्र में यू पी ए की सरकार थी इससे मोदी बतौर मुख्य मंत्री की काफी किरकिरी हुई थी।

कोलोजियम अपने फैसले किस दबाब में बदल रही है ।यह अच्छा संकेत नही है मद्रास हाइकोर्ट की चीफ जस्टिस विजय तेहलारामनी जिनका ट्रांसफर मेघालय हाइकोर्ट किया जाता है जिसका उन्होंने विरोध किया संशोधन की मांग की बाद में इस्तीफा दिया जिसको केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया ।ये वही जज है जिनके तार गुजरात से जुड़े है इन्होंने बिलकिस दुष्कर्म मामले में 11 लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी।फिलहाल एक मामले में टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार सी बी आई के जांच के दायरे में आ गयीं हैं।
इसी  तरह कर्नाटक हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस जयंत पटेल जिनके रिटायरमेंट के 10 महीने बाकी थे।उनको कार्यकारी मुख्य न्यायधीश बनाने की जगह अचानक इलाहाबाद हाइकोर्ट ट्रांसफर किया जाता है इससे उनका ओहदा कम हुआ उन्होंने इस्तीफा दिया।इनका भी एंगल गुजरात से जुड़ा था इन्होंने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के जांच के आदेश दिए थे।

जस्टिस विक्रम नाथ को 22अगस्त को आंध्र प्रदेश का चीफ जस्टिस बनाया गया जिसमें केंद्र को आपत्ति थी लिहाज़ा कोलोजियम ने अपने आदेश में संशोधन कर गुजरात का चीफ जस्टिस बना दिया।

अनिरुद्ध बोस झारखंड के चीफ जस्टिस अब सुप्रीम कोर्ट के जज है।कोलोजियम ने इन्हें दिल्ली हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया । केंद्र सरकार के दबाब में आकर कॉलेजियम ने इन्हें झारखंड में ही बरकरार रखा।

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार किस तरह विभिन्न संस्थानों को अपने हिसाब से चलने को बाध्य कर रही है।चाहे वो सी बी आई हो या ई डी या इनकम टैक्स या फिर आई बी।

मोदी सरकार भ्रष्टाचार को लेकर भी चिंतित है अभी हाल में 62 वरिष्ठ अधिकारियों जिनपर भ्रष्टाचार का आरोप था सेवाएं समाप्त कर दी गई।अब सवाल उठता है कि नौकरशाह ज्यादा भ्रष्ट है या नेता।किसके इशारे पर नीरव मोदी,मेहुल चौकसी के अलावा 36 लोग बैंको का हज़ारो करोड़ का चूना लगाकर देश छोड़ कर भाग गए ।नौकरशाह की इतनी ताकत तो नही,जो भी हुआ होगा उच्चस्तर पर राजनीतिक तरीके से इनको भागने का मौका दिया गया होगा।अब दूसरा सवाल उठता है कि क्या राजनैतिक सत्ता अपने हिसाब से काम कर रही है।प्रशासनिक व्यवस्था राजनीतिक व्यवस्था बन कर रह गयी हो।क्या ब्यूरोक्रेसी का ढांचा बदल रहा है।अभी हाल में 4 आई ए एस इस्तीफा दे देते है यह कह कर कि काम करते वक़्त घुटन लोकतांत्रिक स्थीतियों को लेकर महसूस हो  रही है।मोदी सरकार प्रशासनिक संस्थानों  को खत्म कर सत्तानुकुल राजनीतिक संस्थानों को प्रश्चय दे रही है।नौकरशाही के समानांतर स्वयंसेवकों को नौकरशाही के पद पर आसीन कर दिया।टॉप के प्रोफेशनल के 400 पद विभिन्न मंत्रालयों में नियोक्ति के लिए सृजित किये है जिसमे से 40 की नियोक्ति भी हो गयी है।सरकार ने ब्यूरोक्रेसी को एक संदेश दिया है कि अब आपको स्वयंसेवक बन कर कार्य करना होगा।क्या सरकार मान रही है नौकरशाही ही भ्रष्ट है।

अगर ऐसा है तो क्यों फिर कुछ नौकरशाहों को कैबिनेट का दर्ज़ा दिया जाता है।क्यों कश्मीर में वहां का ज़मीनी नेता सड़को पर नही दिखता है। केवल नौकरशाह अजित डोभाल कश्मीर की सड़कों पर ज्याजा लेते दिखते हैं।क्यों पी एम ओ मंत्रालय के सचिव अनु सचिव को निर्देश देता है कि वो मंत्री को रिपोर्ट न करके पी एम ओ को मेल करके रिपोर्ट करें।यानी मंत्री की स्थिति न घर की है न घाट की है।जो भी है वो पी एम ओ है।सरकार मानती है कि जब जनता ने चुना है तो लोकतंत्र उसके भीतर समाहित है,संविधान तो उसके शब्द हैं,तो प्रशासनिक तंत्र का क्या महत्व रह जाता है?जुडिशरी हो या और जांच संस्थाएं अगर वो सरकार के अनुसार विवेकहीन होकर काम कर रहीं है तो लोकतंत्र का कोई मतलब नही रह जाता।एक आंकड़े के अनुसार सी बी आई  के पास 86 जांच आई ए एस,आई एफ एस, आई आर एस  के लंबित है।2018 के एक आंकड़े के अनुसार 2088 मामले भ्रष्टाचार के लंबित है।वहीं आज संसद में 545 में से 222 दागी है।जो अपने हिसाब से कानून और संविधान के मूल्यों का मूल्यांकन करतें है।

सरकार अगर इतनी ही ईमानदार है तो जो ईमानदार ब्यूरोक्रेट्स है,उनको पनिशमेंट पोस्टिंग पर क्यों रखें है।क्यों नही गुड गवर्नेंस के लिए उनका सद्पयोग हो रहा।इनकी लिस्ट काफी लंबी है इनकी ईमानदारी ही सरकार की नज़रों में सबसे बड़ी कमजोरी बन गयी है क्योंकि ऊपर बैठा नेता खुद ईमानदारी का स्वांग तो रचता है। लेकिन वो खुद बेईमान है।पूरे देश मे 4500 विधायकों में से 1200 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज़ है।यह लोकतंत्र के रक्षक हैं।इससे वीभत्स लोकतंत्र का रूप क्या हो सकता?

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