अक्षय तृतीया में इस समय करे सोने की खरीदारी, बिज़नेस और नौकरी में होंगे कई फायदे

संक्षेप:

  • हिन्दू धर्म में प्रत्येक शुभ काम को करने के लिए शुभ मुहुर्त, तिथि और समय का विशेष ध्यान दिया जाता है
  • इस मुहूर्त में सोना खरीदना बहुत शुभ माना जाता है
  • अक्षय तृतीया पर कौन-कौन से शुभ काम कर सकते हैं

हिन्दू धर्म में प्रत्येक शुभ काम को करने के लिए शुभ मुहुर्त, तिथि और समय का विशेष ध्यान दिया जाता है। लेकिन साल में कुछ तिथियां ऐसी आती हैं जिसमें किसी भी शुभ कार्य को करने में मुहूर्त नहीं देखा जाता। वैशाख मास की अक्षय तृतीया इनमें से एक है। इस बार अक्षय तृतीया 7 मई को मनाई जाएगी। जानते हैं अक्षय तृतीया का महत्व।
अक्षय तृतीया का शुभ मुहूर्त
इस मुहूर्त में सोना खरीदना बहुत शुभ माना जाता है.
7 मई - सुबह 06:26 से रात 11:47 तक

अक्षय तृतीया पर कौन-कौन से शुभ काम कर सकते हैं, इस शुभ मुहूर्त में गृह निर्माण, नवीन गृह में प्रवेश, दुकान लेना, प्रतिष्ठान का शुभारंभ, आभूषण खरीदी, नए व्यापार की शुरुआत, मुंडन, विवाह संस्कार आदि किए जा सकते हैं। अक्षय तृतीया पर तीर्थ स्नान, तर्पण का भी महत्व है। इस दिन चार धाम में से एक भगवान बद्रीनाथ के भी पट भी खुलते हैं। इस तिथि जौ, गेहूं, सत्तू, दही चावल, मिट्टी का घड़ा, फल का दान करना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस तिथि पर भगवान परशुराम का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है।

अक्षय तृतीया की पूजन व‍िध‍ि
1. अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करना शुभ माना जाता है.
2. कुछ लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं.
3. सुबह उठकर स्नान करने के बाद पीले कपड़े पहनते हैं.
4. विष्णु जी को गंगाजल से नहलाकर, उन्हें पीले फूलों की माला चढ़ाई जाती है.
5. इसी के साथ गरीबों को भोजन कराना और दान देना शुभ माना जाता है.
6. खेती करने वाले लोग इस दिन भगवान को इमली चढ़ाते हैं. मान्‍यता है कि ऐसा करने से साल भर अच्‍छी फसल होती है.

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अक्षय तृतीया की कथा
हिंदु धार्मिक कथा के अनुसार एक गांव में धर्मदास नाम का व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता था. उसके एक बार अक्षय तृतीया का व्रत करने का सोचा. स्नान करने के बाद उसने विधिवत भगवान विष्णु जी की पूजा की. इसके बाद उसने ब्राह्मण को पंखा, जौ, सत्तू, चावल, नमक, गेहूं, गुड़, घी, दही, सोना और कपड़े अर्पित किए. इतना सबकुछ दान में देते हुए पत्नी ने उसे टोका. लेकिन धर्मदास विचलित नहीं हुआ और ब्राह्मण को ये सब दान में दे दिया.

यही नहीं उसने हर साल पूरे व‍िध‍ि-व‍िधान से अक्षय तृतीया का व्रत किया और अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार ब्राहम्ण को दान भी दिया. बुढ़ापे और दुख बीमारी में भी उसने यही सब किया.

टिप्पणियां
इस जन्म के पुण्य से धर्मदास ने अगले जन्म में राजा कुशावती के रूप में जन्म लिया. उनके राज्‍य में सभी प्रकार का सुख-वैभव और धन-संपदा थी. अक्षय तृतीया के प्रभाव से राजा को यश की प्राप्ति हुई, लेकिन उन्‍होंने कभी लालच नहीं किया. राजा पुण्‍य के कामों में लगे रहे और उन्‍हें हमेशा अक्षय तृतीया का फल म‍िलता रहा.

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